प्रारब्ध चाहे खींच दे जटिल लकीर ।
रुकना ना कभी तुम ऐ मुसाफिर ।
हार अपनी कभी तुम मानना फिर ।
चल देना समय की बहती धारा चीर।
यह जन्म है कई इम्तिहान का सफर ।
बस लक्ष्य पर रखो तुम अपनी नजर।
होता नहीं स्थिर,सागर में एक पहर।
ढूंढ लेती है किनारा संजोग की लहर।
स्वभाविक समय , बड़ा ही मस्त -निराला ।
कभी रिक्त तो कभी भरता ऐश्वर्या प्याला।
प्रयास से बनाती है मकड़ी अपना जाला।
बह जाओ बस पकड़ समय की बहती धारा।
कर्म की चाल क्यों ना बना दे बंजारा ।
अपना अनुभव ही देता है मन को सहारा ।
दिशा दिखाती है नव अवसान का तारा ।
समय की धार संग पालेगी नांव किनारा।
स्वरचित और मौलिक रचना।
शमा सिन्हा
रांची, झारखण्ड।