कविता समय की बहती धारा

प्रारब्ध चाहे खींच दे जटिल लकीर ।

रुकना ना कभी तुम ऐ मुसाफिर ।

हार अपनी कभी तुम मानना फिर ।

चल देना समय की बहती धारा चीर।

यह जन्म है कई इम्तिहान का सफर ।

बस लक्ष्य पर रखो तुम अपनी नजर।

होता नहीं स्थिर,सागर में एक पहर।

ढूंढ लेती है किनारा संजोग की लहर।

स्वभाविक समय , बड़ा ही मस्त -निराला ।

कभी रिक्त तो कभी भरता ऐश्वर्या प्याला।

  प्रयास से बनाती है मकड़ी अपना जाला।

बह जाओ बस पकड़ समय की बहती धारा।

कर्म की चाल क्यों ना बना दे बंजारा ।

अपना अनुभव ही देता है मन को सहारा ।

दिशा दिखाती है नव अवसान का तारा ।

समय की धार संग पालेगी नांव किनारा।

स्वरचित और मौलिक रचना।

शमा सिन्हा

रांची, झारखण्ड।