Dt.24.2.26
भागते समय को रोक कर जरा।
आज कुछ पल थोड़ा चिंतन करते हैं।
सबने हमारे किए को बहुत है तोला।
सच्चाई उनकी आज हम आंकते हैं।
गलतियां ,जिन्हें हमने अनजाने में किया।
आज उन पर कुछ पल थोड़ा चिंतन करते हैं।
संतुलित कर बराबर उनको पलड़ों पर ।
उनके लिए सहे दर्द को आज मापते हैं।
मुमकिन नहीं,डूब जाना न्याय के सागर में ।
औचित्य पर उनके ,थोड़ा चिंतन करते हैं।
सिद्ध हुआ कहां तक तन मन का समर्पण ।
आओ प्रयत्नों को जांच कर तोलते हैं।
स्वरचित एवं मौलिक।
शमा सिन्हा
रांची, झारखंड।
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