दर्द की दास्तान किसको सुनाऊं

मंच को नमन।
मानसरोवर काव्य मंच
दिनांक:१४.५.२६
विषय:दर्द की दास्तान किसको सुनाऊं

दर्द की दास्तान मै किसको सुनाऊं।

है नहीं कोई साथी जो देगा अपना कंधा।

सुनेगा मेरी दास्तान और पोछेगा आंसू ।

लेकिन आंसू हमें क्यों हैआते।

जरूर ख्वाहिश हमारे भीतर तूफान मचाती हैं।

ना हो ख्वाहिश है तो ना निकलेंगे आंसू ।

और ना मैं खोजूंगी किसी का कंधा ।

किस्मत ने जो दिया है उसमें मिल जाए सुकून।

बुझेगी प्यास और मिट जाएगी अकेलेपन घेरा।

लेकिन ऐसा होता नहीं समय का समय का फेरा।

आकांक्षाओं के साथ आदमी जोड़ लेता है।

अनेक सपनो के साथ ख्वाहिशों में लगता है जीने ।

जब सूरज ही हर समय तप्ता नहीं रह सकता।

तो इस जिंदगी को खुशियों से कैसा है वास्ता।

इस चक्र को अगर हर कोई समझ लेता ।

तो अकेला वह हर बोझ को ढो लेता।

फिर ना किसी को दास्तां सुनाने को खोजता।

ताज्जुब सच्चाई जानकर भी आदमी यह भूल जाता।

जैसे वह अपनी दास्तां है सुनना चाहता।

दूसरा भी उसी की तरह है रास्ता जोहता।
…………………….
स्वरचित और मौलिक।

शमा सिन्हा
रांची झारखण्ड।