प्रभात बेला

ऐ बेला, प्रभात की !नन्हे चुलबुले शिशु की तरह।

मेरी पलकों पर अपनी उंगलियों से करते हो जिरह।

बरसा कर  प्रकाश अचानक पुतलियां खोलते हो ।

स्पर्श से अपने तुम, मेरी दुलारी निद्रा को छेड़ते हो।

 ए प्रभात बेला , तुम्हारा व्यवहार अच्छा नहीं लगता।

तुम हो बहुत मधुर ,  आकर्षक स्वर्ण टुकड़ा सा।

अध मूंदी पलकों से ,दीखता रूप तुम्हारा अपना सा।

क्यों नहीं रुक जाते, सजीले जवा-रंग खिलकर।

निहारती रहू मैं ओढ़े चादर के कोने से छुपकर।

मिलती रहे मुझे ठंडक चांदनी के आंचल की ।

साथ ही नाचो तुम लेकर मनोहरता अल्हड़ सी।

प्रकृति समृद्ध हो जाएं लेकर नित बलैया तुम्हारी ।

  ऐ प्रभात-बेला,आचरण तुम्हारा अद्भुत मनोहरी।

स्वरचित और मौलिक।

शमा सिन्हा

रांची झारखण्ड।