फांसी

अभी बहुत है माया बाकी

मधुपान करा रही बन साकी

बहुत दूर  झलक है उसकी

लेती उसका होंठों से नाम

बीत रही इसी नाटक में शाम।

वहां आवाज पहुंचती नहीं मेरी

भटक रही बन माया की चेरी।

कर रहा वह मेरा हि इंतजार

पर मैं हू उसकी इच्छा से बेजार

उम्र की इस दहलीज पर, व्याकुल  हूं

समझ नहीं पा रहीकहां जजा रही हूं