कभी जिस जगह से मुझे बहुत प्यार था आने का उत्साह हमेशा दिल बेकरार था जाने क्यों वक्त बीत गया कुछ ऐसे परिवर्तन हो गए अब कुछ भी यहां का अच्छा नहीं लगता घर आने का मुंह वजह आकर्षण था शायद मेरी किस्मत में हर कुछ था किंतु यहां का भोगना था कैसे कहूं क्या होता है मुझको आने का मन नहीं करता है और दिल भी टूटा है अब तो बच्चों का भी यहां कोई रिश्ता नहीं रहता वह कहते हैं तुम अपने जिंदगी में इसको भेज दो जिस जगह को मैंने एक-एक करोड़ को अपनी आंखों के सामने दौड़-दौड़ कर लाती थी और घर बनता था फिर उसके सपने बन जाते थे कि कैसे हम रहेंगे इनका मन था कि मैं नीचे रहूं आदि में और आधा पूरा लड़कियों का हॉस्टल चले पता नहीं वह सपना शायद हमने बुरे समय में देखा था इसीलिए कभी पूर्ण नहीं हुआ ऐसा संजोग था घर बनके तैयार भी रहा लोगों ने आंख भी लगाया इतना सुंदर कर इतना बड़ा घर हमारी भी बहुत मनोकामना पूर्ण हुई ऐसा लगता था किंतु जल्द ही सब शीशे के गिलास की तरह से टूट कर बिखर गया पति चले गए और साथ ही चला गया मेरा सारा सम्मान मेरा हौसला मेरे सपने और मेरा उत्साह मैं पीछे-पीछे चलने वाली है दूसरों पर आश्रता हो गई प्यार और सम्मान बच्चों ने बहुत दिया लेकिन मेरा मन कभी ना भारत अजीब सी घुटन अजीब सी बेचैनी हमेशा छाई रहती कहां जाऊं क्या करूं कि मन में चैन हो घर ज्यादातर बंद रहता मैं कभी-कभी आती तो उसे फिर से सजाती फिर से चलना सिखाती लेकिन जल्द ही मुझे लौटना पड़ता पता नहीं क्यों किसी काम की में मुझे अजीब सी घुटन होती थी महत्व सहित हो गई कि मैं अकेले ना जी सकूंगी किराया भी काम देंगे और अपनी मनमर्जी चलाएंगे कितनों के साथ मुझे बड़ा ही बुरा अनुभव हुआ बेज्जती भी हुई मैं करती भी तो क्या करती कोई न था ऐसा जो मेरे लिए आगे खड़ा होता है वह बगल वाले खाने को मेरे दूर के ससुराल के मामा ससुर थे लेकिन उन्होंने मेरा साथ बहुत किया मामी भी हमेशा बहुत प्यार से मिलती है और हर समय तैयार रहती की मौत मेरे यहां आ जाइए मेरे यहां चाहिए किंतु यह संभव न था एक अपना ठहर होना और एक दूसरे पर आशिक रहना दोनों में जमीन आसमान का फर्क है प्रभु ने तो मुझे उठा दिया किंतु मैं ही संभाल न पाए मुझ में उतनी हिम्मत न थी कि मैं अकेले रह करके हर चीज को सवार थी 2016 से लेकर समझे तो 2024 तक मैं ज्यादातर आती जाती रही औरबड़ी खुशी बड़ी खुशी के साथ लंबे समय तक मैं यहां रह जाती कभी 3 महीना कभी 4 महीना कभी तो वह महीना और घर को फिर से सजाती विभिन्न सामाजिक प्रसंग गोष्ठियों कि मैं सदस्य भी हो गई महीने में चार-पांच दिन तो ऐसे ही कट जाते फिर उसकी ऑफलाइन और ऑनलाइन गोष्ठियों में मुझे भागीरथ मिलती तो मैं बहुत अच्छे से समय गुजर लेती आगे पीछे सब चमक रहा था किराएदार भी छोटे-छोटे बहुत सारे थे एक ड्राइवर भी मिल गया था और साथ में एक किसी छोटे पैर में काम करने वाला लड़का भी था जो अपने परिवार के साथ रहता था उसकी बीवी नर्स ऊपर में पंडित जी रहते थे तीन हिसाब किराए पर लगा हुआ था और तीन हिस्सा खाली था लेकिन मुझे कोई गम ना था क्योंकि घर में रौनक थी पंडित जी पूजा करके और उनका जब शंख बजाता तो लगता जैसे कि घर की सारी अशुद्धता दूर हो गई परिवार भी अच्छा था ऐसा काम देते थे लेकिन काम देखते थे मेरा घर चल रहा था अचानक मुझे जब फिर से तकलीफ शुरू हुई तो सारी समस्या आन पड़ी अब रांची कोई आने वाला ना था बच्चे भी कहते की मां तुम अपनी जिंदगी में शक्ति सब सेटल कर लो हम लोगों को कोई इंटरेस्ट नहीं हम लोग में से कोई भी वहां नहीं जाएगा सुनकर कब मुझे बहुत दुख होता था किंतु फिर भी मैं जानती थी कि वह ठीक करें उनकी नौकरी वहां नहीं उनकी रोटी रोटी वहां नहीं तो हो क्यों रहेंगे मैंने बहुत कोशिश की हर इसी कोशिश में एक आईएएस ऑफिसर से बात हुई वह अचानक मुंबई पहुंच गया और मुझे 11 लाख की एक चेक का एक चेक से करके साथ में एक कागज पर अभी लिख कर दिया कि वह 2 अक्टूबर 2025 तक सारा पैसा चूका देगा किंतु समय बिता रहा और वह पैसे की कोई बात ना करता अक्सर कभी-कभी वह फोन करता और कभी कॉलोनी के आर्गेनाइजेशन के अध्यक्ष से तो कभी सेक्रेटरी से बातें करवाता है और उन लोगों का भी यही जरूरत है कि मैं प्लांट सुरेंद्र करके फिर तुझे मैंने इसकी तहकीकात की तो मुझे मालूम हुआ कि वन एक बार जब मैं लैंड सरेंडर कर दूंगी तो मैं अपना अपनी सदस्यता वहां से को दूंगी और मेरी जमीन भी हमारे हाथ से निकल जाएगी वह सैनिक कोऑपरेटिव को वापस हो जाए मैं बहुत परेशान थी क्या करूं कैसे उससे पीछा चढ़ाऊ उसने वादा करके भी पैसे नहीं दिए और इतनी पैसे में यह चाह रहा था कि मैं अपनी जमीन इसके नाम करती हूं अगर सिलेंडर एक बार हो जाता तो फिर यह मुझे जबरदस्ती करता और रजिस्ट्री करवा लेता फिर मेरा पुत्र खड़ा हो गया मेरी पुत्री खड़ी हो गई और दोनों ने मिलकर इस समस्या को सुलझा दिया उसने साफ-साफ कर दिया कि नहीं इस तरह से जमीन की पेंटिंग नहीं हो सकती फिर मेरी बेटी ने पैसे वापस कर दिया दोनों बच्चों पर बहुत जोर पड़ता है किंतु अपनी को समझना है मैं नहीं कर सकती आगे क्या होगा उसके बाद मुझे गॉलब्लैडर की तकलीफ हुई पेट में बहुत दर्द रहता है डॉक्टर ने ऑपरेशन के लिए कहा मुझे ऑपरेशन से डर लगता था ऑपरेशन करना हुआ किंतु दवा से मैं ठीक होने लगी और डॉक्टर शेट्टी यानी दवा देते हैं मैं भी तंग आ गई थी लेकिन आखिर वहीं से राहत मिली थी तो मैं उनकी दवा बेटी रही फिर मैं एक दिन बाथरूम में स्लिप करके उसने पुणे से मैं बिल्कुल ही बेड रिटर्न हो गई स्कैन और एक-रे सब हुआ बहुत ज्यादा चोट नहीं आई थी लेकिन फिर भी उम्र की चोट थी पता मुझे तकलीफ बनी रही मैं एक दो महीने बेड पर ही रहे बेटी ने मेरी बड़ी सेवा की बेड पर ही लाकर हर कुछ देता इस तरह से करीब 2 साल निकल गया और मैं रांची आ भी ना पाए पिछले महीने में आई थी तो भी मैं ज्यादा टिक ना सकी जाने क्यों मेरा मन यहां नहीं लगता अब पता नहीं कहां लगेगा मेरा मन यह भी मैं नहीं कर सकती किंतु मेरे मन में एक अजीब सी पहचानी हो जाती है यहां पर यह मकान बिक जाता है तो मैं भी निश्चित हो जाती नागेश्वर मलिक ने ईश्वर ने इतना मुझे दिया कि तू मैं ही उसकी उसका भोग में कर सके पता नहीं आगे मेरी किस्मत में क्या है इस मकान का हश्र किया है ईश्वर को समर्पित बस इतना ही मैं जानती हूं आज मैं लौट रही हूं मेरा मन नहीं लग रहा सोच के आए थे कि मैं एक महीने रह जाऊंगी बस पता नहीं क्यों मैं भागी भागी सी लगती है मन करता है कहां चली जा नहीं सोचती हूं जो होगा अच्छा होगा बस इसी आकांक्षा से में अपने सफ़र को एक बार फिर से शुरू करें पता नहीं लौट के बाद में कहां रहूं वहां भी कोई बहुत शांति का वातावरण नहीं रहता है आने के समय तो मैं इतना वक्त आ गई थी कि मुझे लगता था कि चाहे पटना रह जाए रांची या फिर हम मैं घूमती रहूंगी लेकिन यहां लौट के ना आऊंगी किंतु अब नाविका की भी बहुत याद आती है और पल्लवी की भी बहुत याद आती है उसके साथ रहते रहते जैसे आदत बन गई ताकि मैं नहीं जानती मेरा क्या निर्णय होगा अब कल मैं पहुंच कर एक दिन तो शायद जरूर रहूंगी कुछ हमारी चाबी भी किधर में छोड़ करके आई गोदरेज की चाबी मैं नहीं लाई ईश्वर ने पता नहीं कहां उसे रखवा दिया मैं तो इतना होशियारी से हर चाबी को अपने बैग में रखती थी और पता नहीं कहां छूट गई बच्चा भी अब देखो पढ़ने में अगर चाबी मिल जाती है तो ठीक है नहीं तो फिर चाबी वाले को बुलाना पड़ेगा बिल्टू भी बहुत लेट है पैसा ₹1100 पर डे के हिसाब सेकाफी काफी पड़ता है लेकिन कोई इलाज नहीं है मेरे साथ कोई रह नहीं सकता सबके बच्चे पढ़ रहे हैं और सब अपने नौकरी पर स्टेटस है आखिर में उनकी नौकरी तो नहीं दे सकती उनका खाना पीना सबका बहुत ऊंचा खर्चा है वह हमारा जमाना नहीं है जब थोड़े से में ही या चावल दाल सब्जी और रोटी सब्जी खाकर हम अपना जीवन बहुत खुशी से गुजरते थे अब तो हर चीज चाहिए बच्चों को तरह-तरह की ट्रेनिंग।