मानसरोवर काव्य मंचतारीख:३०.३.२६शीर्षक:खुद के जैसी दुनिया तलाशना।

“खुद के जैसी ही दुनिया तलाशना”

अक्सर अकेलापन पाकर, मन दुखता है मेरा।

खोज रही रौशनी ,हटाऊ कैसे,फैला यह कोहरा।

लगाती कोयल आम्र वन का नित जहां फेरा।

रिझाती मन के अंदर गुनगुना कर सिर्फ मेरा।

सुनहरा जहां होता, सविता का रंगारंग सवेरा।

लगता है वहीं सदा भावुक मन का फेरा।

बिना रुके आता है जिन पथिकों को चलना।

सीखते वे ही,खुद के जैसी दुनिया तलाशना।

बसेंगे वहां, ऐसे वीर सपनों के मतवाले।

अनगिनत खाकर चोठ,वे नहीं रोने वाले।

चमक सुनहरी लेकर चलते ,ऐसे मतवाले ।

समझेंगे मेरी बातों को,मेरे जैसे मन वाले।

छोड़ फ़िक्र,अलमस्त विचार सिंचित सपना।

पहचाऊं पास उनके निःसंकोच संदेसा अपना।

मेरे जैसे ही अल्हड़ लोग, समझे मेरे भावों को ।

बोलेंगे वे मेरी बोली, समझेंगे वे मेरे दिल को ।

बताऊ कैसे कहां बसी है मेरे सपनों की दुनिया।

लहरायें सुरभित खेत हरे, हो सपनो का जहां।

गूंजे धुन तन मन में,मिलेअंतरमन को पनाह।

पुष्पित बाग, पुलकित परिंदों की कुहुक वहां।

पूर्ण हो परिकल्पना,खुद जैसी दुनिया तलाशना।

स्वरचित एवं मौलिक।

शमा सिन्हा
रांची, झारखंड।