रातें हैं भाती

अब दिन से ज्यादा रातें हैं भाती

आवाज को ई अब नही पुकारती

रातें काली , चैन अथाह लगता है

तन निढाल बिस्तर पर आ गिरता है

जीवन की लड़ाई खत्म हो जाती है

पिघलने सूर्य को शान्ति आ घेरती है

दिनचर्या के बीच मैत्रीपूर्ण नही होती

अक्षरों को लेकर मैं लेखनी से हू मिलती

सुख शांति ले मै अकेलेपन की समृद्धी बटोरते!