अभी पसरी नही बाहें तुम्हारी
खुली नही नयनो की पंखुड़ी
सोच कर मै हूं प्रफुल्लित खड़ी
वह मनोरम रूप जब होगी बड़ी!
मुसाफिर मिले हम बिछुड़ने के लिए
ऋतुयें आती हैं प्रेम सौगात रंगने के लिए
इंतजार करते रहे तुम्हारा पल पल
An educator's life blog
अभी पसरी नही बाहें तुम्हारी
खुली नही नयनो की पंखुड़ी
सोच कर मै हूं प्रफुल्लित खड़ी
वह मनोरम रूप जब होगी बड़ी!
मुसाफिर मिले हम बिछुड़ने के लिए
ऋतुयें आती हैं प्रेम सौगात रंगने के लिए
इंतजार करते रहे तुम्हारा पल पल