ज़िन्दगी की दौड़ धूप में

मानसरोवर काव्य मंच
दिनांक:-१६.७.२५
शीर्षक:-“जिंदगी की दौड़ धूप में”
विधा:-कविता

“ज़िन्दगी की दौड़ धूप में”

ज़िन्दगी की दौड़ धूप में हम यह भूल गए,
कि हम ही इसके सजीव मुख्य पात्र हैं।

छोड़ कर जरूरत अपने वजूद की,
औरों को मात देने में हम लग गये।

ज़िन्दगी जब आधे से ज्यादा बीत गई,
अटपटा सा महसूस हुआ, सांझ थीआई।

दौड़े थे जिनके लिए,वो हमें थे छोड़ गये,
तब समझें, हम तो राह थे भटक गये।

जिस शांति-संतोष को हमें था आज पाना,
वह तो रह गया था पीछे, बनकर बहाना।

हम आज भी एक चौराहे पर थे वैसे खड़े,
ज़िन्दगी की दौड़ धूप में हम लक्ष्य भूल गए।

स्वरचित एवं मौलिक।

शमा सिन्हा
रांची, झारखंड।