क्यों ऐसा जग बनाया तुमने जिसमें रच बस दो ही सपना एक सुख का और दुख का अपना
इतनी सुंदर कृति तुम्हारी रहते हो मनुष्य जन्म अनूपा
सजा उसे तन मन धन से दे दिया उसे दुख का स्वरूप
बने आदर्श स्वरूप राम तुम और बने राजा दधीचि
क्यों अपने रूप में भी दुख का डाला अथाह सागर रूप
था स्वभाव में तुम्हारे प्रेम और त्याग का कर्तव्य पालन
किंतु क्या हर मनुष्य से संभव ऐसा जीवन यापन।
हर दिन बीतता है जैसे युद्ध में हो खड़ा हुआ मनुष्य बन
कर्तव्य के बाद भी रहता ऐसा कुछ अंश मनुष्य में
चाहता जिसमें वह शांति से दिन का यापन
कहूं क्या तुमसे मैं राम, मांगू क्या तुमसे मैं कृष्णा
दिया अथाह मुझे तुमने ,कृतार्थ किया मेरा जीवन
फिर भी व्याकुल रहता है रात दिन मेरा यह मन
क्यों होरहा ऐसा प्रभु ,कैसे करू खुद कोअर्पण।
व्याकुल मन मेरा रहता दिन नहीं अब मेरा कटता
राते होती लंबी काली, असंतुष्ट है जीवन गुजरता।
ऐसा नहीं की कमी है कुछ भी हर तरह से है संपन्नता
फ़िर मन में जाने क्यों मेरे रहती एक अजीब अस्थिरता।