दान
कुछ रोज पहले ही मुझे मालूम हुआ की चित्रा फिर से अस्पताल में भर्ती है उसकी तबीयत ठीक नहीं। सिरोसिस ऑफ लिवर साधारण बीमारी नहीं होती लेकिन किसी का अंत भी इतना लंबा खींचे यह भी संभव नहीं किंतु चित्रा आज से कई वर्षों से इस तकलीफ को झेल रही थी तब चित्रा का स्वास्थ्य इससे अच्छा था वह बड़ी ही स्वाभीमानी और गरिमा वाली स्त्री थी। उसने अपने पति की भी सेवा अकेली ही किया और उसे इस बात का फक्र भी था कि उसने किसी की मदद नहीं ली। किंतु जब जिंदगी ने उसे भी उसी बिमारी के साथ जीने के लिए मजबूर तो वह जैसे टूट गई ।पुन: एक बार ऐसी तड़प ने झझकोर दिया, जिसकी रात कभी खत्म ही नहीं होती थी। उसकी वजह से उसेके जीवन से उम्मीद टूट गई ।धीरे-धीरे उसका शरीर गलता रहा। वह खुद अपने लिए अस्पताल में बेड बुक करती। वहां जाती। डॉक्टर इलाज करते ।दवा मिलती ।तरह-तरह की प्रक्रियाओं से गुजर कर वह घर आ जाती और फिर जैसे कि नया जीवन मिला हो वह बिना किसी शिकायत के फिर से जीने लगती। ऐसा ना था कि उसकी कोई बच्चा ना था। उसकी संतान थी।
विदेश में बेटा एक बहुत बड़ा अफसर बन गया था पैसे की कोई कमी न थी ।उसने उसके लिए रहने के लिए फ्लैट खरीदा। दूसरा फ्लैट किराए से आमदनी का जरिया बनाने के लिए खरीदा। बाद में दोनों फ्लैट को मिलाकर एक बड़ा सा यूनिट उसने बनाया। घर में हर तरह का सामान था। सबसे नए डिजाइन का और सबसे बड़े साइज का था उसके पास लेकिन इन सब सुखों के बीच वह अपने गिरते स्वास्थ्य को कभी रोक न पाई। बेटा कभी-कभी आता और देख कर चला जाता ।वह अकेली ही जूझती रहती थी।
इस बार जब मैं अपने घर आई तो मुझे मालूम हुआ की चित्रा की तबीयत ठीक नहीं। मैंने सोचा मैं उसे अच्छा तो नहीं कर सकती लेकिन कम से कम कुछ देर के लिए इ
उसे अच्छी अनुभूति तो दे सकती हूं ।उसे यह महसूस तो होगा कि कोई ऐसा है जो उसे भी याद करता है ।और यही सोचकर मैं उसके घर जाने को तैयार हुई। फिर मन हुआ क्यों न पूछ लूं ,वह यहां है या नहीं है क्योंकि अक्सर वह हॉस्पिटलाइज्ड हो जाती थी। मैंने फोन लगाया फोन पर किसी पुरुष की आवाज आई ।मैंने पूछा “क्या चित्रा है?”
उसने कहा ,” हां है ।हॉस्पिटल जा रही है ,दिखाने के लिए।”
मैंने औपचारिकता में कहा,” कि ठीक है जब वह अच्छी हो जाएगी तब मैं बात करूंगी ।” लेकिन उस पुरुष ने धीरे से फोन को चित्रा के पास रख दिया चित्रा धीरे-धीरे कुछ कह रही थी। मुझे सुनाई दिया,” भाभी! भाभी !आप आ गई ।देखिए ना मेरी तबीयत फिर से खराब हो गई। मैं हॉस्पिटल जा रही हूं ।अच्छी हो जाऊंगी तो मिलने आउंगी।
मेरा मन अविश्वास से भर गया ।समझ में नहीं आ रहा था कि मैं चित्र को क्या कहूं। उससे क्या पूछूं और उसको क्या बोलूं।
चित्रा को मैं कई साल से जानती हूं पहले तल्ले पर मेरा घर था।जो आता जाता था एक बार जरूर झांक लिया करता था। इसी क्रम में चित्रा भी मेरे यहां आने लगी। बातें होने लगी। उसने अपनी जिंदगी से मुझे वाकिफ कराया । जिंदगी के संघर्ष से जुड़ी तरह-तरह की घटनाओं को सुनकर मैं बहुत उत्साहित होती थी क्योंकि इतनी हिम्मत वाली स्त्री मैंने पहली बार देखा था जो न सिर्फ अपनी जिंदगी बनाई बल्कि अनेक जान पहचान वालों की मदद कर उनकी जिंदगी रास्ते पर लगा दी थी। वह अकेली ही रहती थी उसके पति कई साल पहले कैंसर से स्वर्ग गामी हो गए थे ।किंतु मैंने कभी उसे उदास या चिंतित नहीं देखा था वह अपने सारे काम बहुत चुस्ती से खुद करती थी। वह गाड़ी भी चलाती थी और अक्सर निकट के अनाथालय में अपनी सेवा देने जाती थी। उसके घर भी अनेक प्रकार जरूरतमंद लोग आया जाया करते थे। किंतु जो भी आता कुछ ना कुछ उससे सीख कर जाता ।वह अनेक संस्थाओं से जुड़ी थी, जिसमें अनाथ वृद्ध, स्त्री, अंधे इत्यादि बहुत से सामाजिक संस्थाओं में रहने वाले लोग जुड़े थे। वह इतना व्यस्त रहती थी कि उससे मिलने के लिए अक्सर समय लेना पड़ता था। शायद जीवन जीने का उसने यह तरीका अपनाया था वह कभी खाली नहीं रहती। समय मिलते ही वह अगल-बगल की औरतों को तरह-तरह की कला सिखाती और उनकी कलाकृतियों को कही ना कही विभिन्न अवसरों पर बेचने का भी इंतजाम करती थी। इससे समाज में उसकी एक ब्विश्वसनीयता की साख बन गई थी।
चित्रा के पति को स्वर्गगामी हुए करीब 9 साल बीत चुके थे किंतु वह कभी भी ऐसा व्यक्त न करती कि उसके जीवन में कोई कमी है उसके पास इतने सारे विषय होते की चाह कर भी कोई उसे उसके निजी जीवन के बारे में प्रश्न नहीं कर पाता। एक बार मैंने
चित्रा से पूछा भी था।
“आपको क्या कभी अपने पति की कमी महसूस नहीं होती है?”
वह बड़ी ही सरलता से कहती “भाभी वह बहुत तकलीफ में थे और उनकी सेवा करना बहुत जरूरी थी। यह सब जो आप देख रही हैं ना, यह मेरे पति ने ही किया है। यह सारी समृद्धि मेरे पति की ही है और आज मैं इसी के बल पर अपना भी इलाज कराती हूं और लोगों की भी मदद करती हूं।”
मैंने पूछा ,”आपको क्या हुआ है ?”
वह मेरा मुंह देखने लगी ,”क्या आपको पता नहीं, भाभी !मुझे भी लिवर सिरोसिस है ।और फोर्थ स्टेज है ।अब ज्यादा दिन मैं नहीं बचूंगी किसी भी दिन डॉक्टर जवाब दे सकते हैं ।अगर मैं यह सब काम ना करूं और खाली अपने शरीर के इस रोग के बारे में सोचूं तो मेरी जिंदगी पहाड़ बन जाएगी। साथ ही इतने सारे दोस्त, इतने सारे बच्चे और यह औरतें जो लाचारी के गड्ढे से निकलना चाहती हैं इनके जीवन में अंधेरा छा जाएगा। मैं अपने रोग को किसी हालत में अपने मार्ग में बाधक नहीं बनने देना चाहती। जब तक जिऊंगी हौसले के साथ जीऊंगी और खुश रहूंगी ।यह सब मैंने अपने पति से सीखा है। उन्हें बहुत तकलीफ थी उनका यूरिक एसिड इतना बढ़ गया था कि सारा बदन जलता था। लेकिन कभी भी मैंने उन्हें हताश होते नहीं देखा। मैं जब भी उनको ताकती उनका चेहरा मुस्कुराहट से भर जाता ।मैं भी उनसे पूछा करती थी कि वह कैसे इतने खुश रहते हैं। तब उन्होंने मुझे अपने जीवन से जुड़ी कुछ बातें बताईं।उन्होंने भी बहुत सारी संस्थाओं से अपने को जोड़ रखा था और अपनी कमाई का कुछ हिस्सा वे नियमित रूप से उसमें खर्च किया करते थे। उनके साथ लोगों की दुआएं थी ।कई बार तो जब उनकी तबीयत ज्यादा खराब होती थी तो उनके सहयोगी ही नहीं बहुत सारे ऐसे भी लोग आकर उन्हें ढांढस बन्धाते थे जो उनके सामाजिक कार्यों से जुड़े हुए थे ।कितने अंधे बच्चे आते थे और छोटी-छोटी चीज यहां तक की घास का भी एक गुलदस्ता जैसा बना कर वे बच्चे इनके लिए लाया करते थे मैं देखकर ताज्जुब करती थी क्योंकि तब मैं एक ग्रृहणी ही थी ।घर में रहती थी ।बच्चे जब से बड़े हुए थे तब से सिर्फ अपने मनोरंजन और स्वयं की सेवा किया करती थी। मुझे उनकी उस दुनिया से कोई परिचय नहीं था जहां उनका आनंद का सागर बहता था ।इस सागर से परिचय उन्होंने ही कराया और कुछ ऐसा हुआ जिंदगी में कि उनके जाने के बाद कुछ ही अंतराल पर मैं भी रोगिणी हो गई । उसे स्थिति में मुझे ढाड़स देने वाला कोई न था किंतु इनका चेहरा बार-बार मेरे सामने आता और मुझे उन सब उदासी भरी राहों से निकाल कर एक नई दुनिया बसाने की ओर प्रेरित करता
बस फिर क्या था, मैं भी उसे उदासीनता को त्याग कर पति की तरह अपने से कमजोर लोगों को नया जीवन देने का संकल्प ले लिया। मेरे इस छोटे से प्रयास ने मुझे खुशी का सवेरा उल्हास भर दिन और उमंग भरी जिंदगी प्रदान की ।मैं जब भी किसी अनाथ बच्चे को गोद में बैठाती मेरा मातृत्व पुनः जग पड़ता मैं सोचती आखिर किसने कौन सा गुनाह किया कि इसे मां-बाप से महरूम होना पड़ा और मैं उसी क्षण यह संकल्प करती कि मैं जितना भी हो सकेगा ऐसे बच्चों की जिंदगी रोशन करूंगी किसी को मैं पड़ता किसी को मैं हुनर सिखाती और किसी के विद्यार्थी जीवन में मैं आर्थिक मदद कर उसे सुनहरा भविष्य देने की कोशिश करती सच कहूं तो यह प्रयास और यह गतिविधि मुझे इतना संतोष देती कि मैं अपनी बीमारी बिल्कुल ही भूल जाती । आप विश्वास नहीं करेंगी भाभी की डॉक्टर ने मुझे बहुत पहले कहा था कि मेरी जिंदगी 6 महीने से ज्यादा कि नहीं है लेकिन देखिए आज हमारे पति को गए हुए 9 साल हो गए और मैं स्वस्थ चल रही हूं। हां थोड़ी बहुत तकलीफ होती है लेकिन उसे यह सब खुशी इस तरह से अपने में समेट लेती है कि मैं सब भूल कर और इन बच्चों के साथ इन औरतों के साथ इस दुनिया में खो जाती हूं।”
अक्टूबर का महीना था दुर्गा जी की पूजा का पूजा की सारी तैयारी हो रही थी अपार्टमेंट में एक तरह से उमंग भरा वातावरण अचानक उसे दिन शुक्रवार था और मैं भी पूजा की तैयारी कर रही थी प्रातः उठ करके जब मैं सीडीओ पर धक धक पैरों के चलने की आवाज सुनी एक नहीं अनेक और लगा जैसे कि वह टाटा खत्म ही नहीं हो रहा मेरा मन पूजा में ना लग रहा था मैं उठी और दरवाजा खोल कर देखने लगी अनेक बच्चे बड़े बूढ़े स्त्रियां सब ऊपर की ओर चले जा रहे थे मुझे ऐसा लगा जैसे कहीं कुछ अन्यथा हो रहा है । इस भीड़ में वे अंधे बच्चे भी थे जिनके बारे में चित्रा ने मुझे पहले भी बताया था। लकी देखते हुए एक दूसरे का हाथ पकड़े सीडीओ पर चले जा रहे थे ऊपर की ओर। वे स्त्रियां भी थी जिनको उसने कौशल सिखाया था। मुझे रहना गया मैं भी झटपट अपनी पूजा को समाप्त किया और दरवाजे पर ताला लगाकर उन्हें के पीछे में ऊपर की ओर चल पड़ी चित्रा तीसरी मंजिल पर रहती थी। वैसे तो मुझे डॉक्टर ने सीढ़ियां चढ़ने को मना किया था किंतु आज मैं अपने को रोक न सकी थी उसके घर में प्रवेश करने की जगह न थी सारे कमरे बिल्कुल लोगों से भरे हुए थे। मैंने पूछा क्या बात है इतनी भीड़ क्यों है आज चित्रा के घर में ?”
उन्हें में से एक स्त्री ने कहा आप खुद ही आगे बढ़कर देख लीजिए। चित्रा दीदी को बहुत तकलीफ है पूरे पेट में पानी भर गया है कई बार से उन्होंने अस्पताल के डॉक्टर को भी पूछा था कि वह कब तक ठीक होंगी। सब बस ऊपर की ओर इशारा करते थे और इस बार तो जब वह भर्ती हुई तो डॉक्टर ने कहा अब आप घर में ही आराम से रहे उन्होंने अपने भाई की बेटी को रख लिया था वही खाना बनाती थी और उनके साथ बगल में सोया करती थी आज तो लगता है कि दीदी मां अब बस अन्य जल त्याग करके ही यहां से जाएंगे डॉक्टर आए थे देख कर चले गए हम लोगों को खबर मिली तो हम दौड़े दौड़े चित्रा दीदी को देखने आए हैं उनसे आशीर्वाद लेने आए हैं कि हम भी उन्हीं की तरह मुस्कुराते हुए जिंदगी जिए।”
मैंने आगे पढ़कर कमरे में झांक भीड़ तो बहुत थी फिर भी किसी तरह से लोगों के प पीछे से मैं रूम में पहुंच गई देखा तो चित्र आंधी पड़ी थी थोड़ी देर में ही उसने करवट ली उसका पेट बिल्कुल बैलून की तरह भुला हुआ था मैंने ऐसी हालत में उसे कभी नहीं देखा था। इस बार मैं बहुत दिन पर भी आई थी कुछ व्यवस्था के कारण और कुछ व्यस्तता के कारण मैं फोन पर भी उससे उसका हाल ना ले सकी थी वह बहुत कष्ट में थी
उसे इतना कष्ट हो रहा है इस बार जब मैं मिली तो ऐसी हालत न थी वह बड़े मजे में मुझे हर बार की तरह समाज के विभिन्न कोने की तरह-तरह की घटनाएं सुन रही थी किंतु इस बार वह निहाल पड़ी कराह रही थी। सिरहाने पर एक घंटी रखी थी । बगल में बैठी उसके भाई की बेटी ने घंटी बजाई उसने घंटी बजाई तो एक पढ़ी-लिखी जवान लड़की घंटी को सुनने आ गई । पूछा “यह कौन है?” चबगल में बैठी स्त्री ने बड़ी सरलता से कहा” यह पुष्पा है।” फिर मैंने पुष्पा से पूछा “पुष्पा तुम उनकी क्या लगती हो ?”बोलिए मेरी दादी है ।” मैंने पूछा ,” तुम्हारा घर कहां है ?”मुझे शक हुआ । मुझे उसके परिवार के सदस्यों के बारे में मालूम था उसकी और उसके पति के सिवा बस उसका एक पुत्र था जो अनेकों वर्ष से अमेरिका में बसा हुआ था पुत्र के भी दो बच्चे थे किंतु वह कभी हिंदुस्तान नहीं आते थे चित्र हमेशा अकेली ही रही और अकेले ही जिंदगी की लड़ाई लड़ती रही। मुझे लगा जरूर कुछ वृद्धा व्यवस्था के अ अंतर्गत ही यह लड़की यहां है। इसका कोई रिश्ता नहीं है।बात सच निकली ।वह एक स्वास्थ्य संस्था से थी । उसका नाम” Healthy 20-50 “था ।चित्र के बगल में ही एक किताब पड़ी मैंने चित्र से पूछा या किसकी किताब चित्रा ने कहा यह रोशनी की किताब है भाभी रोशनी को मैं पढ़ाया करती थी ना उसी की किताब मैं खोल कर देखा उसने लिखा था रोशनी सिंह ,पीएच .डी. फ्रांसिस्को।
चित्रा ने कभी मुझे बताया था। फिर मैंने धीरे से पूछा “लेकिन यह लड़की तो फ्रांसिस्को की है आप कैसे उसको पढ़ाती थी। “तभी चित्रा ने उसके बारे में मुझे दो शब्द बताए थे। वह अनाथ थी। चित्रा के फ्लैट के नीचे एक सब्जी के दुकानदार को मदद करती थी।उस दिन चित्रा ने उसकी ही दुकान से सब्जी खरीदी तो वह सब्जी पहुंचने के बहाने वह उसके घर तक आ गई और टेबल पर पड़े अखबार के टुकड़े को ध्यान से पढ़ने लगी उसकी रुचि पढ़ाई में देखकर चित्रा ने उसे अपने खर्चे पर एक प्राइवेट स्कूल में दाखिला दिलाया ।वह पढ़ाई के प्रति इतनी समर्पित थी कि विद्या अर्जन के लिए कि वह अपनी मेहनत के बल पर कई एक स्कॉलरशिप जीती और धीरे-धीरे विद्या की सीढ़ी पर चढ़ते हुए वह डॉक्टरी भी पड़ गई ।वह चित्रा की एहसानमंद रहती थी और हमेशा कहती थी कि “अगर चित्रा ना होती तो वह अशिक्षित ही रह जाती और किसी घर में बर्तन झाडू करती होती।” उस ने अपनी मेडिकल की पढ़ाई पूरी करके अपने ही गांव में एक छोटा सा हॉस्पिटल खोल दिया ।आज ऐसी स्थिति है कि यह न सिर्फ जरूरतमंदों की सेवा करती है बल्कि शहर के भी अमीर रोगी लोग इसके यहां इलाज कराने जाते हैं। जब कभी यह शहर आती है तो मुझसे मिलना नहीं भूलती ।उसी ने यह किताब लिखी है “बुढ़ापा कैसे काटे “।किताब देखकर के मैं चौकी।इतनी कम उम्र में कोई” बुढ़ापा कैसे काटे “जैसे गम्भीर विषय पर इतनी बड़ी अनुसंधान युक्त चर्चा कैसे कर सकता है लेकिन ऐसे जिज्ञासुओं के लिए ईश्वर चित्रा जैसे दूत भेजते हैं । चित्रा ने इस गरीब लड़की को उसकी कल्पना से भी ज्यादा ऊंचा उठा दिया।
अचानक उसे भीड़ को चीरते हुए रोशनी मेरे बगल में आकर खड़ी हो गई और बड़ी ही चुस्ती से अपने बाग से अनेकों औजार निकालकर चित्रा का निरीक्षण करने लगी। सवा अपने चिकित्सीय औजार को अलग रखकर चित्र की आंखों का निरीक्षण की फिर उसने अपने आले से उसके हृदय को भी और पल्स को भी नापा उसके चेहरे पर एक अजीब सी घबराहट थी उसके बाद में वहां खड़ी न रह सकी क्योंकि मैं खुद भी बहुत घबरा गई थी। मैं बहुत मुश्किल से वहां से निकली और सीधे अपने घर में आकर पलंग पर लेट गई जिस तरह से सुबह पैरों की थाप था पी मेरी पूजा को बाधित की थी ,पुनः एक बार वह तक-तक सीडीओ पर घूमने लगी दूसरे दिन मैंने सुना की चित्र हॉस्पिटल में भर्ती तो की गई लेकिन उसकी सांसे अस्पताल पहुंचते पहुंचते खत्म हो चुकी थी। दूसरे दिन के अखबार में चित्र के देहावसान का समाचार प्रथम पृष्ठ पर छाया हुआ था। जिस तरह से उसके कार्य की बडाई का वर्णन था मुझे लगा जैसे वह पूरे समाज का नेतृत्व कर रही थी कितने बच्चे अनगिनत स्त्रियां और वृद्धि जान की आकांक्षाओं का वह सहारा थी सब ने अपने-अपने कथन में बस सिर्फ और सिर्फ उसके चारित्रिक गुना का ही वर्णन किया था पता नहीं कितनों का भविष्य उसने बनाया और कितनों को रोजी-रोटी मिली उसे कितनों का घर बसाया लेकिन एक बात तय थी की चित्रा अपने पति की तरह ही मुस्कुराहटों में जी और समाज में भी सबके होठों पर मुस्कुराहट बांटतीं रही।