यह सफर या पहेलियों की इमारत
मिलती नही जिसकी नींव और छत।
हर पल इच्छाएं खड़ी लगाकर भीड़
ब्याकुल है चित,करने को निर्माण नीड़ ।
प्रयास रेखा चिन्तन का साक्ष्य लेकर बढ़ना
दूसरे पल बलहीन धरा पर आसुओं का गिरना।
स्वप्न धन लेकर ईक पल हवाई उड़ान भरना,
जैसे वृक्ष पर श्री फल को देख उम्मीद करना!
वक्त गुजरता है हम स्वप्नलोक में हैं उड़ते
छोड़ जाना है, सबकुछ ही हम हैं भूलते
आता है होश जब सपना अहं का टूटता
और फिर सब निर्रथक साबित है होता।