बूंद की पुकार

मंच को नमन
महिला काव्य मंच पश्चिम रांची जिला इकाई। विषय:”श्रवण”( ई पत्रिका के लिए, जुलाई 2026)
तारीख:१७.५.२६
शीर्षक-” बूंद की पुकार” "बूंद की पुकार"

फागुन संग चैत ने प्रारंभ किया वर्ष नया आयामी।
देख जेष्ट की छाया, वैशाख हुआ स्व-पतगामी।।

छटपटाई धरती पाकर असह्य सूर्य की गर्मी।
तब अचानक होने लगे जमा, सागर के सहकर्मी।।

श्यामल हुआ नील नभ का आंचल अति विशाल।
तभी पानी की बूंदों ने किया गहन एक सवाल।।

“ए सावन दिया किसने तुम्हें यह एकाधिकार ।
चल देते क्यों समेट बादलों को दिशा,एक ही बार।

उस धरा को नहीं देखते जो पुकार रही बारंबार।
अथक कर प्रयास,वह थका किसान गया हार।।

माना पहनाया बादल ने तुमको अपने वादों का जयमाल।
पकड़ हवा की बांहों को, किंतु किया तुमने हमारा बुरा हाल।।

वह तो है मनमानी, जानती चलना एक ही दिशा।
पशोपेश में रहती धरती मां, मिटे कैसे सबकी तृषा।।

आए हम नभ से मिलने, लेकर अपना रूप अलीशा।
पक्षपाती पवन ने लेकिन बना दिया सावन को मृषा।।

कह रहा सावन ,पुकार कर सागर को बारंबार।
तुम्हारी लोकतंत्र की कमी से,देखो जाते हैं हम हार।।

होती है कहीं अति वृष्टि करता है नभ कठोर वार।
कहीं खड़ी फसल पर पड़ती न्यूनता की असह्य मार।।

खुद से तो हम जाते नहीं चुनती दिशा है हवा की तृषा।
सावन समीर! निष्पक्ष बन,धरा को दे आशीष अमीषा।।

स्वरचित और मौलिक रचना।

शमा सिन्हा
रांची,झारखंड।