घर का माहौल मिला जुला सा था। दिल्ली में इलाज के पश्चात,शुभा की मां एक रोज पहले घर वापस आ गई थीं। देखने में वे स्वस्थ दिख रही थी।सब आश्वस्त थे।किंतु डाक्टर के अनुसार,किडनी से जुड़े इलाज की प्रक्रिया जारी रखनी थी। रक्त आधान पिछले एक महीने से सफलता पूर्वक दिल्ली में चल रहा था।
शुभा ,एक निजी कालेज में सहायक प्रोफेसर थी।उसे अपने काम से कोई शिकायत ना थी।बस जब भी छुट्टी लेने की बात आती तो वह परेशान हो जाती। इस बार भी वह बहुत अनुरोध से एक रोज की छुट्टी लेकर मां को देखने आई। शनिवार और रविवार की छुट्टी मिलाकर उसे तीन दिन मिल गये।
सरोज को घेर कर उसके चारों बच्चे बैठे थे। सिन्हा साहब इस दृश्य को थोड़ी दूर कुर्सी पर बैठे देखकर भावविह्वल हो रहे थे।पाकेट से रुमाल निकाल कर आंसू पोंछने लगे।
“अरे पापा, आज तो दावत का दिन है, आप रो क्यों रहे हैं। मुझे तो वो मां के हाथ के बेसन के लड्डू खाना है। बच्चों ने भी कहा है कि इस बार उनके लिए भी लेकर आऊं। क्यों मां, बनाओगी ना?वो बचपन की यादें कभी भुलाती नहीं। डिब्बो मेंलड्डू ,ठेकुआ ,मढरी भरे रहते थे। मां की कोई मनाही ना रहती थी।मन भर कर, हम ही नहीं, जो भी घर आता बिना खाये नहीं जाता। क्यों मां इस बार तो थोड़े लड्डू जरुर बना देना!”
“तू भी गजब करती हैशुभा! मां को स्वस्थ हो जाने तो दे!”शुभा के बड़े भैया ने डॉटा।
“शुभा को लड्डू जरुर मिलेंगे। मेरी कलाई का दर्द थोड़ा कम हो जाये, बस!अगली बार जल्दी आनाशुभा! तुझे मैं अपने हाथ से बनें लड्डू खिलाऊंगी।”सरोज ने प्यार से शुभा का सिर सहलाते हुए कहा।
“ऐसा करते हैं, मां कि आप सिर्फ बताती जायें और मैं सबको लड्डू बनाकर खिलाऊंगी।”और बिना समय गंवाए शुभा लड्डू बनाने में। अपनी शारीरिक अक्षमता को भूला कर,सरोज भी बड़े उत्साह से उसे लड्डू बनाने की विधि बता ने लगी।
उस दिन शुभा ने सरोज के निर्देश पर बहुत सारे लड्डू बनाये। लड्डू अच्छे बने थे फिर भी सबने एक हीबात कहां,”वो मां के हाथ का स्वाद नहीं!”
शनिवार को शुमा अपनी मां के पास रह गई। ना चाहते हुए भी,रविवार की रात की ट्रेन से वह लौट गईं। सोमवार को पुनः रक्त आधान के लिए सरोज खुद चलकर कर हास्पिटल गई किन्तु वहां से लौटते ही उसकी स्थिति बिगड़ने लगी। घर में अफरातफरी मच गयी। सरोज को पुनः हास्पिटल में भर्ती करवाया गया। मंगल की सुबह उसके प्राण पखेरू उड़ गए । शुभा को शीघ्र लौटना पड़ा।
दुःख से उसका हाल बेहाल था।मां के घर आना उसे तनिक ना अच्छा लग रहा था।वह बहुत असहज थी। अचानक बैठक से सटे कमरे में चली गई।यहां वह सरोज के साथ कई बार अपने मन की बात उससे साझा किया करती थी।वह सारे कमरे को बड़े ध्यान से देखने लगी। अचानक उसकी निगाह एक छोटे से टिफिन पर पड़ी। बहुत तत्परता से उसने उस डिब्बे को खोला। डिब्बा बेसन के लड्डू से भरा था। डिब्बा ले कर वह प्रसाद साहब के पास दौड़ी।
“पापा ,ये लड्डू कैसे हैं ?”
“तुम्हारी मां ने रविवार की रात, तुम्हारे जाने के बाद,तुम्हारे लिए बनाए थे!”
“…और मुझे जल्दी आने को कहा था!”शुभा दहाड़ मार कर गिर पड़ी।