मानसरोवर काव्य मंच
मानसरोवर साहित्य अकादमी
दिनांक २९.५ .२०२६
विषय -छांव सुनती धूप की कहानी
"छांव सुनती धूप की कहानी"
पथरीले र से जब गुजरती है जिंदगानी।
देख छांव की परछाई आस जगती है सुहानी।
रिचा कर उनके रूप से सूरज करता मनमानी।
हिला डाली को दूर सेबुलाती कोपलें हैं सयानी।
कभी भी में जब पड़ते हमारे कदमों के निशान।
थके मन से उठता पग ना जाने कब विस्तृत हुआ विहान।
जैसे-जैसे आगे बढ़ते लगता ठीक बन गया प्रयाण।
कोई ही पल होता ऐसा जब रुकता पथिक महान।
लेकर गठरी सपनों की, तीव्र गति से ,हुआ सहर।
हौसले से करता प्रयास जाने बीते कैसे आठ प्रहर।
दिवस -निशा सतत चलती जैसे सागर की अथक लहर। खोज में मधु के जैसे झूमता गाता श्यामल भ्रमर।
देने को ढांढ़स,पथिक सुलझाता रहता प्रश्न जटिल।
चाहता था पर करना पल भर में विश्व अखिल।
बना कर मनोबल पाषाण सुलझाया उसने पथ चक्रिल।।
निश्चय ही,उसे पहुंचना था , अपनी मुमकिन वह मंजिल।
उसके पास घटनाएं अनेक, सुनाने को राह की कहानी ।
पूरे हुए कैसे सपने उसके,तूफानी थी सफर की रवानी।
खो गया धूप की तपिश में हौसले से भरी जवानी।
संतुष्टि बनी सफलता की छांव ,सुनाती धूप की कहानी।
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स्वरचित एवं मौलिक रचना।
शमा सिन्हा
रांची झारखंड।