“मौत इतना आकर्षित क्यों करती है?”
कहते हैं जग वाले ,माया ग्रसित है इंसान ।
अपार आनंद यह जीवन, जब तक है प्राण।
इस पंच भूत काया के, गुण बहुत है महान ।
राम नाम का जाप कर देती दुखों से त्राण।
कहो फिर जन्म रुलाती क्योंकर उसे है ऐसे ?
जन्म -मरण का क्रम बंधा है प्रकृति के साथ जैसे।
यात्रा पुनः पूरी होगी मौत के संरक्षण में वैसे।
अट्ठासी हजार योनि भोग कर आए संसार में जैसे।
बिलंब ज्ञान समझाया, शरीर नहीं सदा रहता।
समय की चाल से यह जवान और बुढा भी होता।
ज्ञात हुआ उसे अचानक, वह ना सदा जवान रहेगा।
समय की द्रुत चाल से शीघ्र वह भी बूढ़ा होगा।
शुरू अगर यह हुई है तो, खत्म भी एक दिन होगी ।
वह मौत है जो तोड़ जाएगी,उसकी रोती जिंदगानी।
जवानी के फिसलते ही क्षिण शरीर का आभास होता ।
गिरते हुए स्वास्थ्य का अनुभव उसमें है जागता ।
अग्रजों की विदाई उसने, स्वाभाविक ही माना था ।
किंतु साथियों की मौत पर बहुत ज्यादा चौंका था।
अब हर पल वह अपनी विदाई को ही है देखता ।
रह -रह कर अंतर्मन में, बहुत व्याकुल है होता।
पाने को निजात कष्टों से वह हरि को है बुलाता।
रहस्यमई मौत को वह अब शांति दूत है समझता।
अनसुलझी समझ की गांठे,अब सुलझने लगती हैं।
वह समझ जाता, मौत इतना आकर्षित क्यों करती है।
स्वरचित और मौलिक।
शमा सिन्हा
रांची, झारखण्ड।