72 का परिवर्तन

मालूम न था जिंदगी इस कदर हर पल बदलेगी ।

आस की चादर ओढ़ा, सपनों को तोड़ जाएगी ।।

शायद सबकी जिंदगी में होता होगा कुछ ऐसा ही ।

मुझे तो पता नहीं यह परिवर्तन हो चाहे कुछ भी।।

थके शरीर,इस पड़ाव पर नयी गृहस्थी बसाना।

लगता यूं जैसे जिंदगी चाहती मुझे उलझाना।।

एक कोटे से दूसरे तक इस उम्मीद में है जीना ।

जैसे चिड़िया का अनेक खेतों में दाना चुगना।।

जब मिलता कोई किनारा समझती यही बसना।

खूब हो जिंदगी तुम !सुनाती रोज नया फसाना।।

पता नहीं कल का दिवस कौन सा गए तराना ।

जब तक है सांस जिंदगी के साथ है चलते जाना।।

अब भाता नहीं मुझे नए रास्तों पर कदम बढ़ाना

लेकिन हर कर जिंदगी से सामंजस्य है करना।।

घिरी हूं अनेक आशीर्वाद देख रहा ऊपर वाला ।

बस समझ नहीं पाती अपने कर्मों का फसाना।।

नई मंजिल पर सोचती हूं शायद यही मिलेगा रहना

अगले ही पल टूटती है उम्मीदें ,जगता है नया सपना।।

यह कैसा सपना है जो यथार्थ में कभी बदलते नहीं ।

लेकर उम्मीदों को खड़ी हूं, मैं नये चौराहे पर वही।।