बेटे बहू के घर से बहुुत हड़बड़ाहट हम में चले थे!
तैयारी लौटने की विदेश से,पूरी थी पहुंचने केपहले !
किन्तु बहु की इच्छा थी कुछ विशेेष शगुन उठाने की
कोई बड़ा ना था,मौका भी था और उसकी मर्जी थी!
बेटे ने हवाई जहाज में यात्रा के नियम समझाये।
पोते-पोती से हमने भी प्रेेम-भाव बहुत थे जताए !
फिर बैठे चार पहिया वाहन में,सुरक्षा बेल्ट लगाकर ।
खुश थे हम बहुत,छः महीने की बिदेशी यात्रा पूरी कर!
बुनने लगे सपने ,हम क्या क्या करेंगें अपने घर जाकर।
“बैैगेे चेक-इन,सिक्युरिटीचेक”पार कर बैठे”जहाज” पर
मिले आईंस्टाईन उसी कतार में खिड़की वाली सीट पर!
बहुत देर तक मेरी नजर बनी थी उनपर और उनकी मुझपर।
अखिर पूछ ही दिया उन्होंने मुझसे “क्या आप भारतीय हैं?”
“मैं अपने घर लौट रहा।”उम्मीद से ज़्यादा सूचित किया मैनें
“सुना है भारत के लोग होते हैं होशियार !”कहा उन्होंने ।
हमने हुंकार भरी ” सही सुना है,हम तो बैठे बैठे पैसे कमा हैं लेते!”
“अच्छा, ऐसा क्या?चलिए कुछ बाते करें,समय बढ़िया से काटे!”
कहकर लगे खेल के बहुत कठिन उलझे नियम मुझे बताने।
होने लगी बातें लमबी अनेक, हम लगे “प्रश्नोत्तर खेल” खेलने!
उन्होंने बनाये नियम अनेक,लेकिन मेरे मतलब का था बस एक!
“बारी बारी प्रश्न पूछेंगे एक दूजे से दोनों एक के बाद एक!
तुम्हें ना आता हो उत्तर, तो तुम मुझे देना एक रूपये मात्र!
और अगर मैं ना दे सका उत्तर तो भरपाई करूगा सहस्त्र!”
“मंजूर है!मंजूर है!तुम ही पहला प्रश्न पूछो,जांच करो मेरी क्षमता!
हम क्या करे बड़ाई अपनी,तुम तो माने हुये हो विज्ञान के बुध्दीदाता!”
बड़े हौसले से बोल कर आश्वस्त हो ,लगा हंसने हिन्दुस्तानी।
“अमरीका की राजधानी बताओ!” आईंस्टाईन ने तिरछी की पेशानी।
“यह लो एक रूपए अपने!”प्रसन्नचित्त होकर दिया चट उसने निशानी।
आईंस्टाईन उसकी खुशी देख हैरान था,”यह खुश क्यों है इतनाअज्ञानी?”
“अब मेरी बारी है,आप बताए आईंस्टाईन साहब एक चिड़िया का नाम ,
जो पर्वत से नीचे और नीचे से ऊपर करती रहतीहै सुबह से शाम !”
पड़ गया सोच में वैज्ञानिक, एक घंटे बाद कहा खीज कर उसने,
तुम्हीं बताओ उत्तर इसका, आखिर तुम जीते,हार मान लिया मैने!”
“पहले देदो रकम इनामी ,तब मैं तुम्हे बताऊं इस प्रश्न का सच्चा जवाब !”
लेकर पूरी रकम ,उसने जेब में तह लगाया फिर सोगया वह चुपचाप !
“अरे ,उत्तर तो बता दोस्त,हमारा हवाई जहाज पहुचेगा अब शीघ्र भारत !”
“उत्तर इसका मुझे भी नही मालूम साहब!मेरे देश में है आपका स्वागत !”