नारी तत्व

नमन मंच।
लघुकथा प्रतियोगिता।
मार्च,२०२६ "नारी-तत्व"

अक्सर समाज में देखा जाता है कि जब किसी स्त्री से कोई गलती होती है या संयोग वश कुछ ढिठाई हो जाती है तो उसे पुरुष कभी माफ नहीं कर पाता ।यहां तक कि वह उस स्थिति में अपशब्द सुनाये बिना नहीं रहता।यही कारण है कि एक स्त्री अपने स्वाभिमान की रक्षा नहीं कर पाती । गलती पुरुष भी करता है और उसके अहम् का मोल,उस नारी को अपने स्वाभिमान को तोड़ कर देना पड़ता है ।तब भी वह पीछे नहीं हटती ।वह अपने परिवार की एकता और परिवार का सम्मान बनाए रखने का हमेशा आदर्श रखती है ।ऐसी समझ क्यों नहीं पुरुष में होती? गलती कहां हो जाती है उसके लालन पालन में की ऐसी ना समझी उसके मन में हमेशा के लिए बैठ जाती है ?जिसकी वजह से हर स्त्री अपने पारिवारिक जीवन में बहुत बदसलूकी का सामना करती है।पुरुष अगर उसका साथ दे तो पता नहीं नारी आसमान से तारे भी तोड़ करके ले आए लेकिन पुरुष के अहं में इतनी रूढीता होती है कि वह अपनी पत्नी को समझने से बहुत दूर रहता है। उसे लगता है कि अगर कोई सम्माननीय है तो ,वह स्वयं है,उसकी कमाई है और उसका पौरुष है। किंतु उसके अहम् से उसका घर टूट जाता है।

जोड़ा बनाने वाले से ज्यादा उसे बनाकर रखने वाले का महत्व होता है । दो इंसानों का बनाया हुआ यह घरौंदा अकेले नहीं बस सकता ।इसे चाहे हम गाड़ी ही क्यों न कहें । घर का आधार या उसका खंभा या गाड़ी का कोई पहिया अगर कमजोर अथवा टूट जाता है तो दूसरा वहीं का वहीं खड़ा रह जाता है।वह बेकार हो जाता है।

रात बीत चुकी थी ,भोर होने को थी ।सूरज का उजाला आकाश पर छा रहा था आकाश काले से हरा और हरे से नीला,फिर उजाले की ओर प्रसारित हो रहा था। लेकिन उसकी आंखों में ,नींद एक पल भी ना आई थी ।वह बेचैनी से रात भर करवट बदलते बदलते सुबह तक यही सोचती रह गई कि वह क्या करें। ऐसा ना था कि उसके पास सामर्थ्य की कमी थी ।पति ने उसके लिए मकान जमीन पैसे सब छोड़ रखे थे ।लेकिन पति के जाने से उसके जीवन में जो खालीपन आ गया था उसे वह किसी प्रकार भी भर न सकी थी और अकेले रहने में वह घबराती थीं पिछले दो सालों में उसकी सेहत भी काफी कुछ गिर गई थी और वह अब अकेले रहने में हिचकती थी। पिछली बार तो बेटी दौड़ करके आई और उसे उठाकर इस तरह से लेकर आई,जैसे कि आकाश के मार्ग से वह उसे उड़ा कर अपने घर ले आई हो। बहुत सेवा की ,वह अच्छी हो गई। तन से तो अच्छी हो गई लेकिन मन की वह कमजोर बनी रही ।यही कारण था कि वह कोशिश करके अपने घर आ तो जाती थी लेकिन एक सप्ताह दस दिन होते-होते वह बेचैनी से लौटना चाहती थी ।और होता भी यही था। हर बार वह कसम खाकर निकलती थी कि, अब मैं अपने घर में रहूंगी लेकिन फिर भी वह बार-बार बेटी के दरवाजे पर आ बैठती थी। बेटी दामाद दोनों ही उसकी बहुत सेवा करते थे शायद यह प्रभु की कृपा थी या उनके संस्कार था यह तो नहीं कहा जा सकता लेकिन सीमा उन लोगों से बहुत ही एहसानमंद रहती थी ।सीमा की बेटी रजनी की एक ही औलाद थी । कुछ ऐसा संजोग हुआ कि जिस दिन जिस दिन सीमा की बेटी हुई उसी के सप्ताह भर के अंदर उसके पति चल बसे। उस वक्त जो उसके मन की हालत थी वह किसी से ना कह पाई। सारा सामान ,सारी घर-गृहस्ती अस्त व्यस्त सी हो गयी ।कुछ गांव के घर चले गए सामान और कुछ उसके शहर के घर के लिए रवाना हो गए ।वह ना देख सकी ना उनको सजा करके भेज सकी ।उसे पता ही ना था कि उसकी कौन सी चीज कहां गयी ।बर्तन कहां गए और सामान किस तरह से रखा गया ।सब बच्चों ने मिलकर सहेजा और ट्रक वाले के सुपुर्द कर दिया। फिर गांव पहुंचकर गांव के मकान में सामान रखवा दिया और शहर में जाकर के शहर के घर में सारा सामान सजा दिया गया लेकिन अपनी मां को वह वहां ना छोड़ा। कुछ समस्या थी अतः वह उसे अपने साथ न ले जाकर के बेटी के हवाले कर गया। सीमा बेटी के साथ रहने लगी दामाद भी कुछ ना कहते बल्कि कभी-कभी उससे हाल-चाल पूछ लिया करते। लेकिन सीमा के मन में यह बात कचोटती थी ।काश उसका कोई एक बच्चा उसके ही शहर में, उसके साथ रहता। अगर अपने घर में नह रहकर अलग भी गृहस्ती बसाता तो कम से कम पुकारने पर आता।लेकिन आज वह यह सब ना कर सकती थी क्योंकि बेटा विदेश में रहता था और बेटी बड़े शहर में ।जो मीना के शहर से बहुत दूर । रजनी को बच्चा होने के बाद बच्चे को संभालने के लिए बहुत कठिनाई हुई ।उसने बाहर की दाई रखी लेकिन दाई से भी उसका काम ना चला ।जब वह नौकरी के लिए ऑफिस के लिए निकलती तो उसका मन बेटी में ही लगा रहता। हालात इस तरह से बदले कि वह अंत में अपनी नौकरी से इस्तीफा देकर छुट्टी ले ली। बाद में जब बच्ची चलने लगी तो वह फिर नौकरी ज्वाइन की लेकिन वह नौकरी भी ना चल सकु क्योंकि बेटी दिन रात अपनी मां को खोजती और किसी भी शिशु गृह में रहने पर तरह-तरह का इन्फेक्शन लगता जिससे वह हमेशा बीमार ही चलती ।अंत में रजनी ने अपनी नौकरी छोड़ दी और सिर्फ बच्चे को और गृहस्थी को देखने लगी। इसका प्रभाव दोनों के वैवाहिक जीवन पर भी पड़ा बड़े शहर में रहने के बड़े खर्च होते हैं खर्च इतने बड़े होते हैं कि एक आदमी की कमाई से नहीं चलता ।मकान का किराया अलग साथ में नौकर, बर्तन मांजने वाली, सफाई करने वाली, खाना बनाने वाली ,सब चाहिए होता है ।नौकरी करने के लिए कोई घर से निकलता हैं तो फिर घर में संभालने के लिए आदमी रखना ही पड़ता है ।उसका दाम बहुत ज्यादा होता है ।कहने को तो रजनी नौकरी छोड़ दी थी लेकिन फिर भी उसके मन में इस चीज का बड़ा गिला था कि वह इतना पढ़ लिख करके भी अपने बराबरी वालों के साथ खड़ी नहीं है । लेकिन उसके पास कोई रास्ता ना था साल पर साल बीते गए ।बेटी 5 साल की हो गई तब रजनी ने सोचा कि “मेरी तो सभी सहेलियां इतनी ऊंचें ओहदे पर चली गई है मैं कैसे इतनी साधारण नौकरी करूं ?”
रजनी का कैरियर बहुत ही अच्छा चल रहा था जहां भी वह काम करती है उसके सभी सहपाठी ,उसके वरिष्ठ जितने भी अधिकारी थे सभी उससे बहुत खुश रहते। तरह-तरह का उसको मेडल और ट्रॉफी मिला करता था लेकिन अब उसके जीवन में जो एक खालीपन आ गया था उसका कोई समाधान नहीं दिखता था। पति का भी स्वभाव धीरे-धीरे बदलता गया ।हालात ऐसे हो गए कि वह बिना बात के ही चिड़चिड़ा उठना ।साधारण सी बात थी ।घर में बेटी ,बीवी और साथ में एक सास की भी जिम्मेवारी उसके ही सर था। कितना भी वह दबाता लेकिन उसे ऐसा लगता है जैसे कि वह बहुत बड़ा काम कर रहा है ।अहम् इतना बढ़ गया कि अंत में परेशान होकर रजनी ने अलग होने की बात सोच ली। वह अपने सारे सामान निकालने निकाल कर लोगों को देने लगी ।यह देखकर कभी-कभी उसका पति विस्मित होता पर हल्की सी मुस्कुराहट छोड़कर वह और कुछ ना करता ।भारी-भारी चीज उठा उठा कर जब रजनी नीचे रखती तो भी वह मदद करने को ना आता बच्चा भी संभालती घर भी देखी और साथ में अपनी गृहस्थी को भी ।वह काम करना चाहती थी ।अंत में एक दिन उसने अपने पति से कहा कि “मैं अब इस तरह से ना चला सकूंगी ।”
इतना सुन कर भी रजनी के लिए उसमें सद्भावना ना जागी। वह चुप रहता, खाना खाता, सोता ,सुबह उठकर के ऑफिस चल देता । एक सप्ताह बीत गया दोनों के बीच बातचीत बंद थी।अचानक एक दिन रजनी ने उसे खबर दिया उसे कहीं बड़ी जगह बड़े ऑफिस में नौकरी मिल गई थी ।उसकी तनख्वाह इतनी थी कि वह अपनी और अपनी बेटी का खर्च उठा सकती थी ।उसने मां को भी कहा “मां ,तुम मेरे ही साथ रहो ।चलो, हम यहां से कहीं दूर , जहां हमें एक नौकरी मिली है वहीं हम रहेंगे। वहां अपना घर भी है। मैंने पहले वाली नौकरी से वहां एक घर ले लिया था। इतना सुनना था की रजनी का पति तिलमिला उठा ।”तुम क्या समझती हो ?मैं तुम्हारे बगैर नहीं रह सकता। हूं ।मैं खाना नहीं बना सकता। मैं क्या नहीं कर सकता ।क्या मैं तुम्हारे बगैर मर जाऊंगा ?”
रजनी ने कुछ नहीं कहा। वह जानती थी की, बात बढ़ जाएगी और फिर जाना मुश्किल हो जाएगा। वह चुपचाप सामान उठाई ,मां और बेटी को लेकर स्टेशन की ओर चल दी।रजनी का पति भी ऑफिस चला गया पता नहीं उसके जाने के बाद रजनी का पति कब लौटा घर और वह कैसे अपने घर गृहस्ती को चलाया लेकिन अचानक जब एक दिन एक चिट्ठी आई रजनी के नाम तो वह तड़प उठी उसका पति नशाखोर हो गया था। वह रात दिन ऑफिस में भी नशे में ही रहता था ।उसके ऑफिस से ही उसको यह चिट्ठी आई थी कि “आप अपने पति को संभाल कर ले जाइए और किसी नशा छुड़ाने वाले केंद्र में भर्ती कीजिए ।”
सामान्यत:अगर इस जगह कोई पुरुष होता तो वह जरूर उस औरत को कभी ना मुड़ कर देखा होता ,चाहे वह कितना भी रो रोती या तड़पती लेकिन औरत का दिल बहुत भावुक होता है वह अपने हर भाव के ऊपर अपने कर्तव्य को समझती है और इसी कर्तव्य ने पूरे संसार को बांध कर रखा ।ईश्वर ने स्त्री को इसी जिम्मेवारी को थामने के लिए बनाया और शायद यही कमी पुरुष में रह गई है, जिसे वह कभी नहीं समझ सकता और आज भी स्त्री अपनी इसी शक्ति के सम्मान को पाने के लिए कर्तव्यआरुढ़ है।
रजनी की बेटी करीब दस साल की हो गई थी ।उसने अपनी मां को रोते देखा तो पूछा “क्या बात है ?मां, तुम क्यों रो रही हो ?तुम तो इतनी हिम्मत वाली थी। ऑफिस जाती थी ,घर संभालती थी, नानी को देखती थी और मुझे भी तुमने इतना मजबूत बनाया ।आज तुम खुद क्यों रो रही हो ।”
रजनी कुछ ना समझा सकी। वह उठी और अपनी बेटी के सिर पर हाथ फेरने लगी। गले से लगाकर वह बोली “तेरे पापा बहुत बीमार हैं ।”
“मेरे पापा !”
“हां बेटा ,तुम्हारे पापा ,जिस शहर में है ,वह बहुत बड़ा शहर है । वहां उन्हें देखने वाला ,उनका अपना कोई नहीं है। चलो हम कल तीनों चलकर उन्हें ले आते हैं ,यहां। उनकी देखभाल करेंगे !”
“क्यों ?आज तक पापा ने हमें कभी याद नहीं किया ।उन्हें तुम क्यों लेने जाओगी ?”
“नहीं बेटा, ऐसा नहीं कहते! वह तुम्हारे पापा है ।वह तुम्हारे पिता है और उनके प्रति तुम्हारा भी कुछ कर्तव्य है ।उन्होंने गलती की तो क्या हुआ ।हम भी उन्हें छोड़ देंगे? क्या,हम भी वही गलती करेंगे?” कहते हुए रजनी अपनी आंखों को पोछने लगी।
दूसरे दिन सुबह वे तीनों फ्लाइट से रजनी के पति को लेने पहुंच गए। रजनी का पति उसे देखने के साथ ही जोर-जोर से रोने लगा ।”रजनी मुझे माफ कर दो! रजनी मुझे माफ कर दो! मुझसे गलती हो गई! मैंने तुम्हारा दिल दुखाया। मैंने अप अपना कर्तव्य छोड़ दिया मैं बहुत बेअक्ल हूं !तुम नारी हो कर भी इतनी मजबूत हो। तुम्हारे सहारे के बगैर हम नहीं जी सकते हैं। यह मैंने गलत सोचा कि मैं अकेला तुमसे ज्यादा मजबूत हूं ।और जी लूंगा अकेले! मुझे माफ कर दो रजनी!”
रजनी की बेटी ,अपनी मां की तरफ देखने लगी ।रजनी उठी । अपने पति की बांह पड़कर उठाया और गाड़ी में बिठा लिया ।फिर चारों वापस रजनी की नौकरी के शहर को लौट गए।

स्वरचित एवं मौलिक।

शमा सिन्हा
रांची, झारखंड।