“बदली और पर्वत की मुलाकात”
ये देखो कैसे सूरज, बन गया है दिवस का चाँद
बदली ने आलिंगन में सिमटा, लिया उसे है बांध!
अब इधर उधरसे ,बस झांक लिया वह करता है,
मदन बना रति संग जैसे सुहास किया करता है!
पसीज रही है बदली कोमल, तप रहा आकाश!
बीच में उनके पर्वत, छुपकर,कर रहा परिहास!
“ओ काली,काले नयनोवाली,यूँ बिंदिया न चमका,
झीनी सी है चादर तेरी, कमर न इतना ठुमका!
बढ़कर राह जो रोकूं,पहुँचेगी न प्रीतम के पास,
अधीर हो,मेरे पग गिर जायेगी, टूटेगी तेरी आस!”
सुन कर व्यंग्य पर्वत का,वह धीरे से मुस्का कर बोली,
“आदित्य देख, समझ लो मुझको, बस लहराई चादर पतली,
तुम तो बस एक बिंदु स्थिर , धरा पर हो बंधक जैसे,
वह तेजपुंज पहुँचता पश्चिम, प्रातः चल कर पूरब से!”
तेरी तरह वह भी मुझपर,बड़े गुमान से रहता था इतराता
अब जो घिर गया है मुझसे, चंद्र बना आँचल में है छुपता!”
ठिटोली समझ, उस चट्टान प्रखंड ने,हौले से बातें बदली,
“सावन-समीर-सूर्य सब मित्र बने तेरे, इतरा ले,रूप निराली!”
हंस कर कहा घटा ने,”धैर्य धरा जैसे मैंने ,हंस लो,पर्वत राज!
तुमने किया जैसे,हमसब भी कर रहे,बस अपना अपना काज!”
शाम सिन्हा
4-7-19