“बेचैनी जब बढ़ जाए “

“बेचैनी जब बढ़ जाए “

बेचैनी जब बढ़ जाती मन व्याकुल सा होता है।
किसी भी प्रयास से फिर शांत नहीं चित रहता है ।

वातावरण सारा जैसे आंधी की तरह धड़कता है ।
बेचैनी जब बढ़ जाती है हर चीज प्रतिकूल सा लगता है


सबकी मुस्कान में भी एक व्यंग सा भर जाता है ।
किसी के मीठे वचनों में भी धार तलवार सा लगता है ।


जाने क्यों मन बेचैन होकर अंदर बाहर कुछ ढूंढता है
सितारों भरी रात में भी वह व्याकुल सा रहता है।


पाना बहुत कुछ चाहता पर उलझन में मन रहता है ।
वह खोजना है मन का मीत पर कहीं नहीं वह पाता है ।


बेचैनी करता व्यवहार अजीब कहीं न रुकने देता  है ।अंदर बाहर हर दिशा से उसमें व्याकुलता भरता है।

चाहता उससे वह निजादपाना ,पर मिलती सदा अस्थिरता है ।
रोशनी में भी वह खुद को अंधेरे से ही घिरा पाता है।


वैसे तो मनुष्य खुद को ईश्वर सा सक्षम कहता है ।
लेकिन अंदर ही अंदर वह  आंधियों से लड़ताहै ।


हाथ पकड़ कर मीट का वह शांत हो जाना चाहता है ।
लेकिन मिलती उसे शांति कहां जब मीत भी बेचैन रहता है।


अहम् की लड़ाई में विजयी होने को वह तर्क बहुत लगाता है ।
किंतु अंतर्मन की बेचैनी से निजाद नहीं वह पाता है।


विश्लेषण जब वह खुद करता करण अपेक्षाओं को पता है ।
उनसे जुड़कर आकांक्षा उसकी शांत नहीं रहने देता है।


इस बवंडर को रोकने का सम्भवतः एक ही उपाय है ।
हो जाय समर्पित उस शक्ति पर जिसने उसे बनाया है।

स्वरचित और मौलिक।

शमा सिन्हा
रांची, झारखंड।