युद्ध मानवता की हार है मानसरोवर साहित्य अकादमीविषय -युद्ध मानवता की हर हैविद्या -कवितातारीख -२३.४.२६

परब्रह्म ने किया था जब, संकल्प विशिष्ट मानव का ।

स्वयं के विश्व स्वरूप को उन्होंने ,एक से अनेक साधा था।।

मधुरता रंजित प्रेममय सामाज कल्पना थी उनके तप-इच्छा में।

अपनी संतानों का सुगठित, पारिवारिक सपना देखा था उन्होंने

कोमल प्यार के रंग से संजो कर ,रचा उन्होंने हृदय मानव को।

कर आसन ऊंचा समर्पित , किया ,राज्य समृद्ध विशाल पृथ्वी का।।

संतुष्टि हुई व्यवस्थित , इस मनोहर परिवार के हर सदस्य के लिए।

बरसाया आनंद, दिया आशीष,जीवें सब, आनंद के लिए।।

विडंबना बनी-पाकर अपरंपार शक्ति ,देव बन न सका मानव।
लूटने को जग सारा निकल पड़ा बनकर वह दानव।।

वह अभिमानी बिछा जाल कुटिल, फैलाया लूट- छल -कपट व्यापार।

उच्चारित करने लगा न्याय अन्यथा,बरसा कर गोलियों की बौछार।।

मनाना ना चाहा मानव ने, सबके साथ संपन्नता का त्यौहार।

विस्मृत कर अपने विवेक को, विकृत -विश्व युद्ध रचना किया साकार।।

“युद्ध मानवता की हार है “

अब लूट रहा सुख अपने जीवन का, जिस पर वह गौरव करता है।

समझ नहीं रहा यह खून का प्यासा,यही युद्ध मानव की हार है!

स्वरचित और मौलिक।

शमा सिन्हा
रांची, झारखण्ड।