मंच को नमन।
मानसरोवर काव्य मंच
दिनांक -२८.४.२६
विषय – लफ़्ज़ों को समझने वाले
विधा -कविता
“लफ़्ज़ों को समझने वाले ।”
जग में हर कोई चाहता है।
बोले वही लफ्ज़ हर कोई ।
जो उसका मन चाहता है।
अफसोस,नहीं है समझ उनमें।
ऐसी जो समझे लफ्जों को!
जवाब में जगत कहे वही ।
जो भाता है उनके मन को।
उनसा बन समझना विचारों को।
चाहिए समझना पहलेभावों को।
एकाकार होना होगा उनके मन से ।
सहज सौहार्द जोड़ लफ्ज़ से।
आदान प्रदान होवे मन के तागों से।
गूथ कर धागा धीर- विश्वास का ।
रंग जाए मीत जो अपने रंग में मतवाले।
विरले मिलते लफ़्ज़ों को समझने वाले।
स्वरचित और मौलिक रचना।
शमा सिन्हा
रांची,झारखण्ड।