मंच को नमन।
मानसरोवर काव्य मंच।
विषय :दिल में कई हसरतें बाकी हैं।
तारीख :१२.५.२०२६
जीवन के बाजार में आदमी खड़ा है ।
आवश्यकताओं की फेहरिस्त ने जकड़ा है।
सपनों की गठरी लिए दौड़ रहा है।
गिनता, दिल में कई हसरतें बाकी है।
वह अकेला अर्जन करने वाला है।
सीमित कमाई के स्रोत से परेशान है ।
अपनों की ख्वाहिशों को ढोता हैरान है।
उसके दिल में कई हसरतें बाकी है।
जब पड़ोस से पकवानों की खुशबू आती है।
छुट्टियों में जब मोहल्ला पहाड़ों पर जाता है।
नामी संस्थानों में अन्य बच्चे पढ़ते हैं ।
उसके दिल में भी कई हसरतें बाकी हैं।
उपभोक्तावाद ने सबको मतवाला किया है।
निति नूतन बदलाव विश्व में आ रहे हैं ।
खाना-कपड़ा-घर-गाड़ी-दवा,शोर मचाए हैं ।
सबके ही दिल में कई हसरतें बाकी हैं।
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स्वरचित और मौलिक रचना।
शमा सिन्हा
रांची, झारखण्ड।