मंच को नमन
महिला काव्य मंच पश्चिम रांची
तारीख- 9 -6 -2026 शीर्षक-” पानी”
विधा -कविता "पानी"
पानी की महिमा है विशाल और न्यारी।
पाकर इसअमृत को मानव बना है आज व्यापारी।
वसुंधरा के परिस्थितिकीतंत्र का इस पर अधिकार।
कण-कण रमते जीवन का जल ही है सार।
पिघल रहा हिमगिरी विशालसारा है।
नदी- ताल सब बेचैनी से सुख रहे हैं।
संचित जल मृदुलता कहां जा रही है।
बेचैन वसुंधरा प्यास से जूझ रही है।
कट रहे वृक्ष,नहीं बच सकती अब रचना कोई ।
बनस्पति बिना रह सकता नहीं ,जीवित मानव ही।
जल बिन वसुंधरा नष्ट हो जाएगी सब।
क्या मानव बचा सकेगा अपने को तब?
आर्कटिक की हिमशिला तड़प कर कह रही।
” धार मेरी खोजो, देखो कहां तक बही।”
खड़ी सुखी नदी तीर, सोच रही पनघट पर गोपी।
“लेकर खाली गागर है क्यों कर मैं लौटी।”
“यह पानी ही जब अस्तित्व में नहीं रहेगा।
फिर वर्चस्व का युद्ध क्या कुछ भी जीतेगा?”
वह कालीमा रंजित जीत जाने कैसा धुन गा रही? बनकर दुश्मन, मानव जाति निरर्थक परचम लहरा रही।
स्वरचित और मौलिक।
शमा सिन्हा
रांची, झारखण्ड।