देख रहे सब आस तेरा ओ बरखा रानी!
प्यासी धरती कि तू ही तो है बेटी प्यारी सुहानी!
मीठी सरस तेरे मुक्ता-बूंदन की, पायल सी है वाणी।
बांह पसार,स्वागत है तेरा ओ! समृद्धि की वरदायनी।
तू है अनोखी ,तन मन को खुशियों से है रंग देती ।
जेठ मास की असह्य ताप से सबको देती तू मुक्ति।
सबकी उन्नति के लिए ही तेरी बंदे हैं जीती।
तज कर लेकिन जीवन अपना ,कुछ भी नहीं है लेती।
भिंगा कर रोम रोम देती है तू ऐसी मीठी तृप्ति।
तुम्हारी रचना की कला ने तोड़ी गहरी सुषुप्ति।
फैला रंग हरा ,ओढ़ी चुनरी जो सज कर धरती ।
सखी संग डाल गलबइया चलने लगी हवा मुस्कुराती।
लगी गूंजने किलकारी ,बाबुल के सूने अंगना।
आई डोली, लेकर संग रक्षा-बंधन के लिए बहना।
मेहंदी का रंग व्याकुल होकर सहसा लगा पुकारने सजना।
शोभने लगा बाग बगीचा, देख बाबुल का झूला बांधना।
हरिहर के नाम लगा गुंजने चौमासा गाना।
आषाढ़ -सावन -भादो- क्वांर में करते बादल गर्जना।
बहन,कर रही अपने प्रिय जनों के लिए मंगल कामना।
जगु उम्मीद हर घर -आंगन में,भरेगा समृद्धि का सोना।
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स्वरचित और मौलिक रचना।
शमा सिन्हा
रांची, झारखण्ड।
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