"स्त्री का कौन अपना"
यह प्रश्न बड़ा असहज है सबका।
“भला कहो स्त्री का कौन है अपना?”
लाइ जो जीवन को रोशनी के प्रांगण में।
सींच कर सबके प्राण अपने तन मन से।
दिया जिसने जगत को जागृत सपना।
पूछ रहे वही, कहो स्त्री का कौन अपना?
नहीं जरूर उसे किसी भी परिभाषा की।
स्वयं सिद्धा वह जननी सारे जगत की!
रचनाकार अलौकिक वह ईश्वर सी!
परम ज्योति वह अप्रतिम सूर्य प्रभा सी!
कर मुखरित वाणी संसार की, प्रखर किया रचना।
आत्मसम्मान रक्षा में उसने सीखा सदा तपना।
बनना खुद की पहचान ही है उसका सबसे अपना।
जग ने सीखा उसी से है कदम रखना ।
चारित्रिक गुणों की प्रभा है उसकी रचना।
संचित मनोबल ही उसका सबसे अपना।
स्वरचित और मौलिक रचना।
शमा सिन्हा
रांची, झारखंड।
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