मिले मात-पिता दोबारा

             “मिले मात-पिता दोबारा”

जन्म क्रंदन  उत्सव बना,सबने था खुशी से सुना,
पुनःआजआवाज से मेरी, पिता ने कुशलता है बुना;
आँगन में रहा न मेरे अब,छुपा कोई भी कोना सूना,
आने से उनके ,बड़ी जिजीविषा जीवन की कई गुना !

शब्दो में भी दूर रहना  अब उनसे, मै नहीं हूँ  चाहती,
आशीष में उनके, स्नेहपाश -आनंद नित हूँ भरमाती;
अविरल मंगल कामना, कुशलता की उनसे हूँ पाती,
पाकर सौभाग्य विशालता, प्रति पल हर्ष से हूँ इतराती।

कभी नहीं खोजते मुझसे, किसी काम की पूर्णता,
इसी भावना से बंधा ये मन, मुझमे है उनकी ममता ।
मैं किसी को कैसे बताऊँ, मेरा है एक विशेष  रिशता ,
पल पल बबढती ही जा रही,  इस बंधन की  प्रगाढता।

कर रही,दुआ यही, मिले आपको  स्वास्थय, लम्बी उम्र ,
देख आपको , साहस से भरता है मेरा विघटित यह सब्र।
हर काम को मेरे, विस्तृत कर ,करते हैं आपअसीम गर्व ,
प्रशंसा के  लिफाफे मे रख, करते सबके सामने जिक्र !

है प्रार्थना, प्रभू कृपा होअसीम ,मेरे माता-पिता पर,
द्वार गुजंन हो निरंतर निर्मल मधुर कोकिल स्वर ।
बूँद इन्द्रधनुषी सुख की, रहे बरसती मेंरे इस नैहर,
दिवस रात्री सम-प्रकाशित हो,शीतल किरणें आढो पहर!