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रहे गई है कुछ कमी
नित करती हूं मैं नियम अनेक फिर भी पाती नहीं तुम्हे देख। मेरे कान्हा करती हूं क्या ग़लती, व्याकुल यूं क्यों होकर मैं फिरती? कहो तुम्हारे वृन्दावन में ऐसा क्या, गोपाल बने मटकते वन में जहां? माना अच्छा ना था भोग हमारा पर अब तो हैं मेवा मिश्री भरा! रखती मैं तुम्हारी सेवा में वह…
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“मन को पत्र “
तुझको समझाऊ कैसे रे मन ,तू मेरा कैसा मीत, परिंदों की उड़ान,श्रावण समीर या है गौरैया गीत ? उड़ा कर साथ कभी ले चलते मुझको, इंद्रधनुष को छूने, घर के छत से बहुत ऊपर खुलते झरोखे जिसके झीने। बिना रोक टोक के चलतीं जहां, चारों दिशाओं से हवाएं, चमकती है चांदनी जहां से, और टपकती…
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“मुझे चाहिए!”
एक सखा सौहार्दपूर्ण चाहिए जो सुन ले। मेरी हर बात अपने पास सुरक्षित रख लें।। गलतियों को मेरी ढक कर दफन जो कर दे। दुखते जिगर के तार को स्पर्श कर सुकून दे ।। गम्भीर उसके बोल यूं हृदय में मेरे पैठ जायें। सुनकर जिसे मिट जायेअपेक्षा-मनोव्यथायें।। हो उसके पास ऐसा वह धन, सन्तोष की…
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जीवन, पानी का बुलबुला
जीवन में संचित सारे सुख की लम्बाई है बस एक पल। बारिश की बूंदों सी,पलक झपकते जाती मिट्टी में मिल।। अभी अभी जो जन्म लिया इसलिए ही वह था रोया। इसलिए ही नये वस्त्र पाकर,तनिक ना वह खुश हो पाया।। स्मृति पटल ने चित्र साझा किये, अनेक पिछले जीवन के। व्याकुल हुआ देख खुद को…
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“मेरी अपनी -हिंदी भाषा “
मंच को नमनमानसरोवर साहित्य अकादमीमानसरोवर ई बुक पत्रिका हेतु, मेरी रचनादिनांक -12.9.24विषय -“मेरी अपनी- हिंदी भाषा “मेरी अपनी हिंदी भाषा” हृदय से आभार है मेरी अपनी हिंदी भाषा को।सौहार्द जगाकर जोड़ जाती मेरे सबअपनों को।। दूर देश बसे बच्चों में घोल देती असीम मृदुलता।मिलाती हर समय सहेलियों को इसकी सहजता।। कोयल सा कोमल सुरीला होता…