• ” करवाचौथ “

    स्नेह रंजित अनुपम है यह सुहाग त्योहार । भरा जिस में त्याग- समर्पण-निर्मल प्यार ।। दीर्घ काल का साथ, दो आत्मा होतीं समर्पित। जैसे यह धरती और चंद्रमा इकदूजे को हैं अर्पित।। कार्तिक माह के चौथे दिवस को चांदनी जब आती। पैरों में बांध पैंजनी,तारो जड़ी चुनरी चमकाती ।। भर कर अंंजली पुष्प-पत्र-जल करती अर्पण।…

  • “ऐसा क्यों होता है?”

    क्यों, कभी कभी दुआ भी गलत मांग लेतें हैं हम! खुद को ही बस, जीत का हुनरबाज मान लेते हैं हम! सामनेवाले को हराने में, खुद ही हार जाते हैं हम, और गम को छुपाने में, सबकुछ बता जाते हैं हम!…………… वो क्या कहेंगें, हम पर हसेंगें, यही विचारते रह जाते हैं हम! वो भी…

  • “प्रभु, सुन लो बिनति!”.बना दिया है अपना अंश मुझे,दिया वह सब अभिलाषित गुण,फिर क्यों नहीं सम्भव वह सब ,जो चाहता प्रति पल मन अब?

    सशक्त शरीर क्षीणकाय रहा बन,स्मृतिह्रास अब हो रहा क्षण क्षण,आस सुहास समेटती दुर्बलता कण,मूक दृष्टा बन, निहार रही मैं सब। रुदन से ही होता है यह कथा प्रारंभननवजीवन पर्व बनता,शिशु का मंगल क्रदंनहर्षित मात पिता,होता है गुंजित कुल -कुंजनअवतरित मानव बनता,पूर्ण परमात्म स्पंदन! श्री सशक्त रहे अब भी,सत-आत्माऔर तन,निर्मल सहज रहे,पुरस्कृत यह यात्रा जीवन,मालिक, रख…

  • “कद ना नापो”

    श्यामल मेघआच्छादित फुहारों तले,टिप टिप बूंन्दो से बिंधती ,कोपलेंमिढ्ढी में धसी दूब ने सहसा पुकारा,“कभी मुझसे भी हाथ मिलाया करो,माना, तुम्हारा कद है ऊंचा बहुत, परइन लंबे दरख्तों को शर्मसार न करो ।ये भी,झाडिय़ों के बीच से निकल करहंसते हुये लताओं के साथ बढतीं हैं।तुम इंसा, भूलकर सत्य ,मुझपर चलते हो।मन को मन मे रख,हम…

  • “अकेलापन “

    खुद को अन्तर्मन से जो मिलवाये,अनुभवों को सुलझा कर समझाये,लेेकर भूली बिसरी याद जो आ जाए,मिठास भरा अपनापन दे जाये,कितना प्यार भरा इसमें,कैसे समझाएं?वक्त के घावों को धीरे से सहज सहलाये!अपनों की कद्र, परायों का मान बढ़ाये!जंग जीतने के कई रहस्य हमें समझाए !हार को हटा,जिन्दादिली भर जाये!स्वाभिमान भरा अनेक नई राह दिखाए!भरकर प्यार, असीम…

  • “प्यार का बन्धन”पुकारो प्रेम से ,कहो ना उसे,बंधन!वह तो बना है मेरे हृदय का स्पंदन !मासूमियत गर्भित वह महकता चंदन,करता मन जिसका प्रतिपल वंदन!

    तुम पास रहो या बस जाओ मुझसे दूर ,गूंजती रहती तम्हारी तान सुरीली मधुर।धड़कते श्वासों में बसे हैं तुम्हारे ही सुर,मेरा जीवन बना जैसे राधा का मधुपुर! क्या नाम दूं इसको, यह रिश्ता कैसे समझाऊं?प्रतिपल साथ मेरे, मग्न मैं इसको ही निभाऊं।“खुशियां तुम्हारे चूमें चरण!”मै गीत यही गाऊं,तुम पर ही अपना सर्वस्व न्योछावर कर जाऊं!…