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“मैं ढूंढ रही अपनी वाली होली!”
कहां छुुप गई वो रंंगीली प्यारी होली,आती जो बन अपनी, लेकर संग हुल्लड भरी बाल्टी , लाल- हरी नटखट सजनी? हमें भुलाने , मां हाथों में रखती,दस पैसे वाली पुड़िया कई, अबरक चूर्ण मिलकर जो बन जाता,चमकता रंग पक्का सही! हम शातिर बन इकट्ठा करते, बाजार में आई नई तकनीकी, भैया दीदी काम आते,पोटीन की बनती…
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मात्री दिवस पर-मेरे अनमोल पल!
वह मनाती नित त्योहार है ,अपने उस संसार कासजा उसका एक घरौंदा है, स्नेह भरा संतानों का!नाम अनेक पर वह एक ही रुप मे सगर है बसती,स्नेह दान का व्रत अखंड ,कभी नही वह हैतोडती।अविस्मरणीय होते हैं उसके कुछ आलोकित पल,आजीवन संजो रखती जैसे पुष्प,पंखुड़ियों के दल!जब भी वह पल वह पल याद आता हैसब…