Category: Hindi Poetry
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सूर्य
जिनका है उदित और अस्ताचंल रूप मनोरम, आठों पहर शक्ति जिनकी, रहती सदा सम! प्रगट होते देेव वही,सुमधुुर स्पंदित अरुणाचल, मिटा अंधेरा, दीप्त करते,नभ से पृथ्वीतल! सातो दिवस धरती पर आते सूर्य देव हमारे, पाकर दर्शन जिनका, कृतार्थ होते पृथ्वी वाले! निरख रुप साकार जिनका ,अर्पित अंजली भर जल, तत्क्षण मानव समाज बनता, तन मन…
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आज तेरा जगराता ,मां!
मैं आई तेरे द्वारे मां,लेकर अपनी लंंबीअर्जी संंग लाई हू सजे थाल में तेरी रंंग-जवा चुनरी! आज मुझेअपना लेना मां,मन ने आस लगाई ! तेरे ही दर पर सबने मां,मनसा-ज्योत जलाई! हर पल मेरे साथ तू रहती,सुलझाती कठिनाई, अखंंड दीप तुम्हार जलता,रोशनी सबने पाई! महिषासुरमर्दिनी हो तु ,शुंभ ,अशुंभ को तारी! गलतियां सारी माफ करो…
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“कहां मुकम्मल जिन्दगी?”
रोज रोज की छेड़ छाड़ मुुझसे ना करो ऐ जिन्दगी तुम्हारी जिद पूरी करने मे खाक होती है जिंदादिली! औरों की उचाईयों को तुम ,छूने की करो ना कोशिशें चाहिए खुशी तो मन को बांधो,समेट रखो ख्वाहिशे ! कर्तव्य के रास्ते में सदा सबके,आती हैं रुकावटें बहुत, टूटता है धैर्य कभी और बचती नही हिम्मत…
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मन की आंखें
मंच को नमन शीर्षक-मन की आंखेंविधा-कवितातारीख-8- 4 -24 वे होतीं हैं सबसे समझदार,तोलती पक्ष ,दिशा आर पार!तत्व का खोज लेती गूढ़ सार,सक्षमता गढ़ती सत्य आकार! स्वरचित एवं मौलिक शमा सिन्हारांची।
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“मजाक”(Ranchi kavya manch)/”ध्यान के अंकुर”(for Mansarover sahitya)
पल पल घर में गूंजाना किलकारी! प्रिय बनाना शब्द उच्चारित सबके, चेहरे पर सजाना ,चमकती मीठीहंसी! तह पर तह सजे सारी ऐसी बात, ए हंसी तुम आओ झोली भरके! मीठी यादें भिंंगोये हमारी पलके! वही लौटने को मन चाहे दिन रात जहां फिर हम सब हो जायें सबके! बिछे नही प्रतियोगिता की बिसात हंसी ठिठोली…
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मेरा मन
जाने क्यों यह मन बहुत परेशान हो जाता है कुछ नही बस में किंतु निदान खोजता रहता है समझा समझा कर मै हारी,मानना नही चाहता जाने क्यों इस भेद को स्वयं सुलझाना चाहता है! कर्मो ने लिख दिया है नियती की दिशा का नाम उसे हमारी इच्छाओं से नही कुछ भी काम ! लाख तुम …
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मां
जब भी खुलती हैं आखें तुम्हे काम में व्यस्त देखा जगी रहती हो पहर आठ, तुम ऐसी क्यों हों मां? आंंचल में भर प्रेम अथाह,खड़ी क्यों रहती सदा ? गलतियों को मेरी माफ करने को क्यों हो अड़ी रहती? अपरिमित मेरी मांगो पर कभी क्यों तुम नही टोकती ? तुुमसे अक्सर मै रूठ जाती,क्यों तुम…
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“देखो मचा धमाल, हुआ ये कैसा हाल!”
मनभावन यह मौसम,बसंत लेकर है आया देखो गूंंजा बुलावा कृष्ण की मधुुर बांसुरी का! “ना आउंगी खेलने होली,तुझसे ओ चितचोर, तूने किया विह्वल ऐसा,पिहू! पिहू बोले मोर! वृंदावन के छोरों में ऐसी लगी आज है होड़, किसने कितनी मटकी फोड़ी, कन्हाई रहे जोड़! मैनें भी कसम है खाई,रंग तब ही उनसे लगवाउंगी , आज माधव…
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“ओ अश्रृंखल बादल!”
मकर रेखा से उत्तर दिशा में कर रही था अविका गमन, तभी बादलों के बीच क्योंकर करने लगा रवि रमण ? बसंत आया ही था कि नभ पर हुई शयामला रोहण! “हितकर नही होता इस वक्त मेघों का जल समर्पण !” कह उठी धरा उठा हाथ,अपनी हालत श्यामल मेघ से। पर वह उच्चश्रृंखल करने लगा मनमर्जी…
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होली
हे कृष्ण, तुम लेकर रंग ना आना इस होली पर, कुंज गलिन ने बिछा दिया, चम्पा गुलाब राहों पर ! गिनती करते मैं थक गई,बीते कितने सूने पहर, करना ना तुम बहाना अब देखो टूटे ना मेरा सब्र! “लौटूंगा शीघ्र!” कह कर,छोड़ गये हमें गोकुल में, सखा ढ़ूढ थके तुम्हे,गलियां मथुरा-वृंदावन राहों के! खेलेंगे हम …