Category: Hindi Poetry
-
आओ चलें अयोध्या
मंच को नमन! मानसरोवर साहित्य अकादमी “आओ चलें अयोध्या नगरी” आओ चलें अयोध्या,चले सिया राम की नगरी!मन रहा रघुुवर त्योहार,”अगर” सुवासित सगरी!आओ चले अयोध्या…..हवन-कुंड सहस्त्र बने,होम करें विशवामित्र-बशिष्ट !प्रसाद सभी पायेगें हवन का “राम हलवा”अवशिष्ट !आओ चलें अयोध्या……दशक पचास ,मिला था इक्ष्वाकु-वंशको अन्याय !वीर भक्तों नें दी जान,पश्चात मिला न्यायालय न्याय!आओ चलें अयोध्या…..हाथ जोड़ हनुमान…
-
जाड़े की धूप
“जाड़े की धूप” मिलती जाड़े कीधूप हमें,काश अपने ही बाजार में! होता इससे सबका श्रृंगार घर के सुुनहरेआंगन में! फिर सबके नयन नही, जोहते बेसब्री से उसकी बाट! कपड़े भी झट सूखते,नही लगती इतनी देर दिन सात! पर शायद!ऐसा सपना कभी नही हो सकता है पूरा! विज्ञान का,प्रकृतीरहस्य में हस्तक्षेप होगा बहुत बड़ा! आज धूप…
-
जाड़े की धूप
मिलती जाड़े कीधूप हमें,काश शहरी बाजार में! होता इससे सबका श्रृंगार घर के सुुनहरेआंगन में! फिर सबके नयन नही, जोहते बेसब्री से उसकी बाट! कपड़े भी झट सूखते,नही लगती इतनी देर दिन सात! पर शायद!ऐसा सपना कभी नही हो सकता है पूरा! विज्ञान का,प्रकृतीरहस्य में हस्तक्षेप होगा बहुत बड़ा! आज धूप छुु़ड़वाता काम,तब होती है…
-
मातृ भाषा को नमन
नमन मंच को। मुुखरित होते हैं जिससे,सबके मन के भाव।मां सा प्यारा रिश्ता उससे ,फैलाता जग पर अपना प्रभाव ! शब्द उसी के, आवाज उसी की,कोई नही है उससे दुलारा! जीवन के सारे अनुभवों की अभिव्यक्ति, नमन उसे है अनेक हमारा! शुभकामनायें।🙏
-
नये घर के आंगन से
क्या किसी ने पुकारा? घर किसे कहते है,मैं सोचती हैैरतअंदाज सजी कोठरिया या गूंजती हसी का साज वह तिल तिल जोड़ता, नये सपने बुनता “हर ईट को मैंनें इन हाथों से है अरजा कल के कष्ट भरे पलों को कफन उढाता गर्व से उठा कर सिर वह अक्सर कहता, बनाया यह महल सबके महल से…
-
The Whistling bird
A sweet long shrill whistle followed me Every time I peeped out of the window to see! Surprised I was to find none there to be In search, I strayed through lanes, in hours wee. Lazy air, camly enclosed me wherever I be, I knew not opening this secret lock with key! Confused I was,…
-
तमन्ना
बर्बाद करती है रौनक इसकी,जिन्दगी को नही देती चैन इसकी शख्सियत एक पल को! सुबह-शाम घड़ी से तेज चलते है इसके कदम, आप ना चाहें फिर भी रहती है साथ हरदम! इसका नशा बि
-
विडम्बना
विडम्बना बांधा था मां यशोदा ने कृष्ण चंद्र लाल कोगोपियों की शिकायत. माखन की लूट को ब्रम्हांड कौ जो बांधे,रस्सी कौन बांधे उसको?विधीका विधान देखो,कुपूत ने बांध मा बाप को! आंख लाचार,पैरों से हुआ मुश्किल चलना!जतन करें कैसे,कठिन है दो वक्त का खाना! उम्मीद रही टूट ,किया शुरू अंधेरे ने घेरना!सब धन लुटाया जिनपर वही…
-
सौंदर्य
“सौंदर्य” कल तड़के सुबह सवेरे,आया जब नगर निगम से पानी, स्फूर्ति से उठाकर पाईप मैं चल दी नहलाने क्यारी धानी। बोल उठी खिली बेला की कलि”देखो हुई मैं सयानी! मेरी खुशबू पाकर, तेजी से आ रही वह तितली रानी।” “अभी अभी मै खिल रही हूं,प्यास बुझा दो देकर पानी। दो क्षण पास ठहर जाओ,बातें बहुत…