Category: Hindi Poetry

  • आंख चुराना

    मन को भाता तेरा, गोप बालकों संग खेलना मोहन! आंख चुरा कर,मार कंकरी टूटी मटकी से लुटाना माखन ! बड़ा मनोहर लगता जब मैया लाठी ले दौड़ाती तुझको! छुप करआंचल में, कथा नई सुनाकर ठगता तू उसको! तेरा खेल बड़ा निराला,विशाल पशुधन का मालिक होकर चोरी कर खाता! देेख छवि अपनी मणी खंभें में,झट नई…

  • “प्रगट हुए कौशल्या के राम “

    मंच को नमनR V N महिला काव्य-मंच,झारखंडता: 8-1-24विधी- कविता “प्रगट हुए कौशल्या के राम” सहसा उपस्थित हुए ,राम भक्त शिरोमणी वीर हनुमान। उच्च स्वर शंखनाद कर जगाया सबका कुुल स्वमान ! सेवा में रहते सदा समर्पित, हृदयासीन सीताराम काज! उतरा स्वर्ग जमी जैसे,आये काक भुशुंडि और गरुड़ महाराज! लहराई लााल विजय ध्वजा ऊँची,चमका कौशलेंद्र का…

  • बिडम्बना

    विश्व हिंदी सृजन सागरविषय_ चित्र लेखनविधा_ कवितादिनांक_07/01/2024 विडम्बना बांधा था मां यशोदा ने कृष्ण चंद्र लाल कोगोपियों की शिकायत. माखन की लूट को ब्रम्हांड कौ जो बांधे,रस्सी कौन बांधे उसको?विधीका विधान देखो,कुपूत ने बांध मा बाप को! आंख लाचार,पैरों से हुआ मुश्किल चलना!जतन करें कैसे,कठिन है दो वक्त का खाना! उम्मीद रही टूट ,किया शुरू…

  • मन का पंछी

    मंच को नमन।मान सरोवर साहित्य अकादमीआज की पंक्ति – मन का परिंदाविधा-कवितातारीख-5/1/24 “मन का परिंदा” बड़ा दुलारा है वह मनमौजी, अपनी ही चाल से है वह चलता। इच्छाओं की तह से निकल कर, अचानक ही वह है उड़ने लगता! रहता नित नूतन परिहास में डूबा! भंग शांति कर,वह व्यंंग सुनाता। सिर-चढ़ा वह, कभी बात ना…

  • “खामोशी”

    रेतीले कैक्टस के पौधे पर एक पुष्प था खिला। अगल बगल के फूलों ने उसे बड़े गौर से देखा! सब अपने साथीयों को दे रहे थे ढेरों शुभकामनायें; छेड़ रही थी”नव वर्ष”रागिनी पेेड़ से झूूलती लतायें! अनदेखा उसको कर, वे लगे झूमने दूसरी दिशा में! “वक्त ना था साथ उसकेअभी!”उसे बतायाअंतर्मन ने! पुकारा खिली पंखुड़ियों…

  • अन्तर्मन से आखों की बात !

    मिली आज चेतना को मेरी, बड़ी अनोखी एक सौगात! अंतर्मन नेेत्रों को हुई , विश्व देख रही आखों से बात ! बांटने में थे दोंनों तत्पर अपनी अपनी उलझी गांठ! बताया एक ने तभी,”बिछी बाहर चौपड़ की बिसात !” मझधार से दूजा खींंच रहा था नौका ,बीच समुंदर सात! दोनों ही धे उलझे बहुत, खड़ी…

  • ममता की रचियता

    तुम चाहे कुछ ना कहो!अपना परिचय भी ना दो!मौन तुम्हारी परिभाषा है,जीवन की तुम ही आशा हो! सफल परीक्षण ममता करती,उद्घोषक हो सबके नियती की!तुम शक्ति, तुम ही हो सरस्वति!जीवन दायक ,तुम ही हो धारिणी! माता ,मित्र,सेविका सहचरी हमारी!हर रूप में लगती अपरिमित न्यारी!भरती खुशियां,सुन हमारी किलकारी!सृजित कण कण ब्रह्मांड तुम्हारी धूरी!

  • “नये वर्ष के लिए “

    कल्पना से भरी हुई अपेक्षा की तस्वीर , सुखमय और जीवन्त सुधार की तदबीर! चुन कर खुशबू फूल हरश्रृंगार,रंग-अबीर, पूर्ण करूंगी अधूरी मैं वह अपनी ताबीर ! आकाश को मै कुछ ऐसे हिस्सो में बांटूंंगी, पुष्पित कुंज-गलियों में गायेगी कोयल काली! आधे मे शरमायेगा सूरज,सजेंगे ऐसे बादल , बाकी में नाचेगा चांद,साथ चलेंगें तारे पैदल!…

  • बीते वर्ष की सैर/जाता हुआ वर्ष

    अनुुभव बहुत सारे बटोरकर रख लिया है। इसीलिए लिए तो आज वह याद आया है। समेट अपने सारे,एक एक रंग बिरंगे पंख ठंड मे हीआया था,उड़ गया फुर्र से नभ! स्वस्थ और मस्त था”दह-चूड़ा”,सूर्य-संक्रांती का, लाजवाब स्वाद खिचड़ी-चोखा,पापड़ अचार था! फिर मची धूम शादी ब्याह और भोज के न्योता से। उम्र के इस मोड़ पर,इम्तिहान…

  • “लम्बे सफर में”

    गतिरत रचना प्रभू की जैसे है विचरती। सूर्य-चंद्र और नभ की विधा सारी दीखती । यह जीवन भी अविरल चलता सदा रहता है! बिना रुके कर्म का हिसाब करता रहता है। सारे जीव बंटे है कर्म अनुसार कई श्रेणी में। गगन और धरती के बीच डोलते हैं बंंधन में। सफर यह नायाबअंतहीन चलता ही रहता…