Category: Hindi Poetry
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मन को कैसे समझाऊं
यह मन रुकता नही क्यों कभी
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“समझदारी”
जब सब बोल रहे हो तो वह चुप रहने को है कहती। हो रहा हो जब अन्याय तो, शांंति फैलाने आ जाती! अनुजों को धैर्य दे, समझा कर है बस में कर लेती! कभी हक के लिए उठती आवाज में है समा जाती! अग्रज के चरणों में सेवा सदा अर्पण है यह करती , बड़े…
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ससुराल की सैर
“ससुराल की सैर” नई दुल्हन आई थी नये घर,नया हुआ था ब्याह! मन ना लगता,याद आता नैहर,चेहरा हुआ था स्याह! मोहिनी सी सूरत बनाया उसने,मेकअप सारे हटा कर, “आज अम्मा के घर जाऊंगी!”, कहने लगी रो रोकर । बन्ना अलहड़ जवान,प्रतिदिन करता दण्ड -बैठक मस्त! खाने का बड़ा वह शौकीन और पचाने मे था बहुत…
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हाथ पकड़ लो
हाथ पकड़ लो मेरा मोहन!, कर दो बेड़ा पार , तुम से ज्यादा कोई नही,करता मुझको प्यार ! मन के तुम ही भीतर, तुु ही बाहर विराजते बिन मेरे बताये भी तुम हो सब कुछ जानते! एक ही बात मुझे खलती है,तुम्हे है सब मालूम, साकार रूप धारण कर क्यों साथ नही रहते तुम? यही…
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“मुस्कान “
परिस्थिति कोई हो,सहज देता यह सबका समाधान । “अहंआनंन्दम”,रंग देता चारो दिशा सम्पूर्णआसमान ! दूरी सारी मिट जाती,अपनेपन की सजती है होली! रंगोत्सव चिबुक खेलता,आखें बोलती प्रेम की बोली! अपने में छुपाये रखता,यह जाने कितने गमों की रोली, इसका मूक मधुर संगीत बनाता दिल वालों की टोली! पल भर मे ही यह कह डालता बातें…
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आलोचना
अस्त्र यह विपक्ष का,करता निरंंतर चित है चंचल ! धैर्य बना विद्रोही, रक्षा आपकी करता ढाल बनकर! आपके गुणों का यह सुंदर निर्विकार सत्य चित्रण है! महत्वपूर्ण कितना है कोई ,विपक्ष की यह घोषणा है! अपने विवेक चिंतन से मन में करलें सहज विश्लेषण , तत्काल व्यक्त हो जायेगा,है सच्चा कितना सम्प्रेषण ! एक मुस्कान…
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प्रशंसा
कल तड़के सुबह सवेरे,आया जब नगर निगम से पानी। स्फूर्ति से उठाकर पाईप मैं चल दी नहलाने क्यारी धानी। बोल उठी खिली बेले की कलियां”देखो हुई मैं सयानी! मेरी खुशबू पाकर, तेजी से आ रही वह तितली रानी।” “अभी अभी मै खिल रही हूं,प्यास बुझा दो देकर पानी। दो क्षण पास ठहर जाओ,बातें बहुत…
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“आशीर्वाद “
मन के सद्भावों पर आरूढ़ ,करता बल संचार , असमंजस में असमर्थ की करता है यह बेंड़ा पार! मात-पिता- गुरू- देव से अविरल होता यह संचार शिरोधार्य कर लेता जो शीश , वह जाता वैकुंठ पार! फल फूल रहा वह मानव,यह धन जिसके पास है निर्धन बन जाता बली,जिसके कर्मो में इसका वास है! लक्षमन…
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“नमस्कार”
मिलन भर जाता है इसकी विनम्रता के मिठास से, सुखमय बनती है सभा सभी,इसके ही सौगात से! डूबता है हृदय हमारा विनीत प्रेम के उद्गार में, झुक जाता है शीश सभी का स्वागत के आभार से! अग्रज -अनुज सभी , अति उमंंग आनंद- विभोर हैं होते, विलक्षण इसके अनुुराग सेअपना पक्ष भी सभी हैं भूलते!…
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“चांदनी रात”
पग पग मोती लुटाता देखो,आया बन कर सजीला बन्ना चांद गांठ जोड़ ठुमकती आई है दुल्हन नखरीली चांदनी साथ! रात्री ने नभ की नीली चुनरी पहनाई उसमें बुनकर तारों का साज, चार पहर रस्म निभाकर, बन्ना-बन्नी होंगे इक दूजे के आज ! लेकर शहनाई बैठा चकोर, दे रहा चेतावनी वह सोमदेव को, “रूप प्रिया का…