Category: Hindi Poetry

  • “क्यो कहूं?”

    क्यों कहूं मै थक गई गति ही जब प्रकृति है। ठहरता नही कहीं रास्ता, चलना ही उसकी रूचि है। क्यों कहू अब मै हार गई श्रम ही श्रृष्टी की है प्रकृति। चलती रहती निरत हवा है, बाधा छोड बस दिशा बदलती! क्यो कहूं,मेरी आस छूट रही, जब श्वास डोर से है बंधी वहीं। पुनः पूर्व…

  • कभी रुक जाओ!

    कभी सब छोड़कर, बिना वजह आराम करना अच्छा लगता है छोड़ ढीला हाथ पैर बिना कारण छत ताकना अच्छा लगता है होते ऐसे पल,देखने को घड़ी, एक बार भी मन नही करता है। गूंज रहा होता घर,होते बच्चे पास या कोई होती व्यस्तता बस एक ही बात चित में अक्सर भर देती है अथक तत्परता…

  • Help me walk

    It is dark,Road not visible Tired is soul, tredding not possible! Wherever you direct, in humility Make it a lovable fond activity ; Sink me deep into your thoughts Fill in my breathing as you instruct! Let prospects be filling in accordance will and service to humans with patience

  • ठण्डी हवायें

    सजल सरल चंचल ये हवायें इस बैशाख मे ठण्डी बनायें रोक उन्हे लूंगी अपने बगीचे में, कहूंगी आज इन पौधे को भरमायें । गर्मी ने ली मदमस्त अंगड़ाई बांह पसार अपनी शक्ति दिखलाई तपिश खींच,सविता के किरणो की अनमना ढीठ हो गयाआकाश भी! छोड दिया परिन्दों ने ऊंची सैर रहते पत्तो बीच जमा डाली पर…

  • आयुष्मान भव

    Oumहमारे अर्णव को जन्मदिन की ढेरों बधाई!🥰💐🥮🌻🍡 “आनंदित रहो तुम, सर्वदा होवे वर्षा स्वास्थ्य और संतुष्टी की, उपलब्धियां तुम्हारी बने विस्तृत, आकाश के परिमाण सी! चिरंजीवी भवः!आयुष्मान भवः पुरुषार्थी भवः!यशस्वी जैसे पाट- पयोधी ! स्वमान बने सम्मान तुम्हारा,रहे अटल रघुवर कमान सी! कुल-कुलीन के तुम भविष्य रचयिता ,पाओ अनंत कृपा ईश-आशीष की, प्रेम-शान्ति-सत् ऐश्वर्य जीवन,…

  • लौट रही जिन्दगी

    मौन को कुछ दो साल से मिल गई थी छूट चिडियों की चहचहाहट उसे बस प्रातःलेती लूट खाली रहने लगी थी सड़के,सारे शब्द गये थे टूट, अपनो से बिदाई,तन्हाई ,उदासी हो गये थे एकजुट! घर की चार दिवारी ,नाप गई थी कदमों का विस्तार, असीमित भय इतना,भूले से भी कभी ध्यान ना जाता उसपार

  • सजा ली है मौत ने अपनी बारात

    सजा ली है,मौत ने निडरता से अपनी बारात बना लिया सबके श्वास को,उसने है सौगात। दे दी है मोहलत ,कुछ सबको खुशहाल जीने की, गीत गाकर रही,जीलो कुछ पल बिन्दास जिन्दगी। लेकर हाथ में श्वेत शाल,साथ वह चल रही संग हर घड़ी , तोड बंधन सारा,काटकर रख जाएगी माया की कडी। लेकर नाम राम का,बिछा…

  • मेरी कश्ती

    दीखती नही है कश्ती,नजर आता नही किनारा, बदल गया सब कुछ, जाने कहा गया वो नजारा! नये उत्साह से शुरू होने को था नये सिरे से सफर सहसा दर्द ने बिंधे तन से,कदम रुके लडखढाकर। रह न सकी मै खड़ी, टूटे मनसूबे सारे बिखरकर फरिश्त पूरा न हुआ, कागज पर लकीर बस रह गई जुडकर।

  • पूछो इनसे!

    पूछो इनसे किसके स्वागत मे खिलती ये गुड़हुल की कलियां,लाल रंगीली! मीठा रस-पाक भरकर आचंल में बुला रही डाली पर परिन्दे नन्हे! देखो उनकी चतुराई हठीली पंख पसार बैठ डाल हरियाली मधु सुगंधित बनाने ले जाती हैं रस, रानी की खिदमत में फिर जाती बस! हरे चमकते पत्तों की बिछा कर चादर बुला रही मधुबन…