Category: Hindi Poetry

  • चरैवेति चरैवेति

    “चरैवेति चारैवेति” देखो,जनमानस में आई नई जागृतीचल पड़ी हैअब ,सूनी पड़ी सड़कें भीअर्थहीन बनी, COVID19 छाया भीनिर्भीक वज्र-हस्तआस की,है जगी। कई बार आये हैं, पहले भी विक्रांत बहाव,धीर-सहष्णुता ने डालने दिया न पड़ाव,ढीला न किया समाज ने साहसी कसाव,“विश्वास,बसंत आएगा”भर रहा है घाव। मनु -संतान भयभीत न कभी है हुई,,पहाड भी कदम न उसके रोक…

  • अनुज हूँ इसलिये झुक जाती हूँ

    अग्रज हूँ, झुक जाती हूँ

  • आदतें बदल रही हैं

    “आदतें बदल रही है” आदतें बहुत बदल रहीं हैं, मेरी खर्च की लकीर हो रही है टेड़ी, पहले मन को बहुत दबा लेती थी अक्सर छूट, मैं खुद ही हूँ दे देती। तब हर पाई का हिसाब भी थी रखती , अब लंगर से निकली, नाव सी बहती ज़बान की उड़ान पर पोटली है उड़ती,…

  • खुशी से भेट

    खुशी से भेट

    प्रश्न बहुत सारे, मैं हूँ उससे करना चाहती, बस फुरसत से खुशी ,जो कुछ देर मिल जाती। आंसरा, देखती रहती हैं दो आँखे चारो पहर, पर ठहरती, वो मेरे लिए है बस एक ही पल। हौसला देती रहती,मीठे सपने है अनेक दिखाती, अभी आई नही कि अभी बेचैन हो निकल जाती। एक मैं ही नही,रास्ता…

  • हमारा मन

    हमारा मन

    अजीब है मन,नित् नया रूप बसता इसके कणकण! उमंग, हौसला ,हार-जीत,खुशी-ग़म का मिश्रण है मन। अपनी ही अटखेलियों में, उलझा रहता है इसका तन, कभी आप ही हँसता है, तो कभी रुठ जाता है,यह मन। सुबह की सुर्ख किरणे, गुदगुदा देती है मीठे से जब तन, जाने क्या सोच, शाहंशाह बन अंगड़ाई लेलेता है मन।…

  • “क्या होगा सोच कर”

    सोचती थी ,कभी जब सब स्थिर होगा फुरसत के छन में बैठूंगी,बाते करूंगी। मन को राहत मिलेगी,शब्दो को आयाम, समय को गिनना भूल ,दोनो करेंगें आराम। इंतेज़ार में वो लम्हे अनगिनत निकल गए, उम्मीद में, साथ वो भी पल छिन गिनते रहे, बेसब्र मोहलते, रहे हम इर्द गिर्द तलाशते, नई दिशा, नए ख़्वाब रहे हम…

  • माँ – तुम मेरे साथ हो

    ऐ नारी, तुझमे ऐसी कौन सी नई वह बात विलक्षण है,हर बार, पल पल, प्रतिछन तू बन जाती कुछ खास है??बिजली कड़के बादल बरसे, पृथ्वी डोले, तू अडिग हैघोर अंधेरा छाये, तू धातृ स्थिर-स्तंभ हिम्मते-आस है! स्नेह-अंक में भर, नौ मास, संरक्षित-पोषित नायाब किया,तन मन सब मेरा अपनाकर,अटूट बंधन ही बांध लिया!कटी नाल, हम रो…

  • उसने फिर टोका मुझको!

    उसने फिर टोका मुझको!

    “अरे तुम यहाँ खड़े, किस को तक रहे हो?”चौक गई मैं देख, सड़क किनारे हंसते उसकोआसमां मे सूर्य चढा था, लेकर अपनी गर्मी कोनीचे नीलाम्बर समेटे, देख रहा था वह मुझको। “मैं तो तुमक़ो भाता था,क्यों भूल गई हमको?टूटी दिवाल के कोने से, उखाड़ लाई प्रातः को।दर्द हुआ बहुत फिर भी घर बनाया था गमले…

  • तुम ही कहो,कौन सी बात कहें?

    तुम ही कहो,कौन सी बात कहें?

    तुम्ही कहो, वो कौन सी बात कहें हम,सुनकर जिसे, और भी जिक्र करो तुम।हवा मधुर मधुमास, होठ भी मुसकराते रहें,हाथों मे हाथ लिए, बस साथ चलते रहे हम। तुम्ही कहो किन लफ्जों को कैसे चुनें हम,मैं दिल की सुनु या सिर्फ मन की सुनो तुम।या दोनो मिल कर, एक ऐसा फैसला करें,इक-दूजे की हर बात…