Category: Hindi Poetry

  • तू नही सर्वश्रेष्ट, ऐ मानव!

    ग़जब का संस्कार, ये धरा के फूल रखते हैं!मस्त मौजें-नशा की डुबकी लगाते रहते हैं!खबर खुद की न होश, हाले-हवा की लेते हैं!जब चाहा, बाहें पसार पंखुडिया बिखेरते हैं! सुख का दुःख का, इनको कभी शिकायत नहीं,बसंत या ग्रीश्म की बेमुरव्वत बेरुखी हवा भी,जज्बात रहते, मधुर, नित स्थिर, श्रावणी से हीअल्हड़ से मुस्कुराते मिल जाते…

  • कलियों का निमंत्रण

    कह रहीं रंग भरी ये उत्साहित कलियाँ, अधखिलीजाओ न अब तुम दूर, खिलने को हम व्याकुल अति।आये हैं बरसाने को भर आचंल, नौ रस तेरी बगिया सारीयाद करो वह भी दिन थे, जूझ रही थी, सूखी, नीरस डाली। फूलों का खिलना, सपना लेकर जीता था वह माली।किसलय को ही पाकर, रोमांच भर लेता था अपनी…

  • प्रभु, सुन लो बिनति!

    बना दिया है अपना अंश मुझे,दिया वह सब अभिलाषित गुण,फिर क्यों नहीं सम्भव वह सब,जो चाहता प्रति पल मन अब? सशक्त शरीर क्षीणकाय रहा बन,स्मृतिह्रास अब हो रहा क्षण क्षण,आस सुहास समेटती दुर्बलता कण,मूक दृष्टा बन, निहार रही मैं सब। रुदन से ही होता है यह कथा प्रारंभननवजीवन पर्व बनता, शिशु का मंगल क्रदंनहर्षित मात…

  • ऐसा क्यों होता है?

    क्यों कभी कभी दुआ भी गलत मांग लेतें हैं हम!खुद को ही बस, जीत का हुनरबाज मान लेते हैं हम!सामनेवाले को हराने में, खुद ही हार जाते हैं हम,और गम को छुपाने में, सबकुछ बता जाते हैं हम! वो क्या कहेंगें, हम पर हसेंगें, यही विचारते रह जाते हैं हम!वो भी सोच सकते हैं, यह…