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Ebb and Flow

An educator's life blog

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  • सजा ली है मौत ने अपनी बारात

    May 29, 2022

    सजा ली है,मौत ने निडरता से अपनी बारात बना लिया सबके श्वास को,उसने है सौगात। दे दी है मोहलत ,कुछ सबको खुशहाल जीने की, गीत गाकर रही,जीलो कुछ पल बिन्दास जिन्दगी। लेकर हाथ में श्वेत शाल,साथ वह चल रही संग हर घड़ी , तोड बंधन सारा,काटकर रख जाएगी माया की कडी। लेकर नाम राम का,बिछा…

  • मेरी कश्ती

    May 29, 2022

    दीखती नही है कश्ती,नजर आता नही किनारा, बदल गया सब कुछ, जाने कहा गया वो नजारा! नये उत्साह से शुरू होने को था नये सिरे से सफर सहसा दर्द ने बिंधे तन से,कदम रुके लडखढाकर। रह न सकी मै खड़ी, टूटे मनसूबे सारे बिखरकर फरिश्त पूरा न हुआ, कागज पर लकीर बस रह गई जुडकर।

  • Confusion

    May 29, 2022

    Education makes no difference Mind is though in surveillance pot is minutely holed of its sense It can’t hold long with patience ; A wonder decends leaving emptiness Courage drains smearing easiness, it is futility,surrounded strangeness Expect not, for death has no softness ! There’re minutes,hours, days of longing Working on puzzles time prolonging .…

  • Looking unto YOU

    May 29, 2022

  • पूछो इनसे!

    May 29, 2022

    पूछो इनसे किसके स्वागत मे खिलती ये गुड़हुल की कलियां,लाल रंगीली! मीठा रस-पाक भरकर आचंल में बुला रही डाली पर परिन्दे नन्हे! देखो उनकी चतुराई हठीली पंख पसार बैठ डाल हरियाली मधु सुगंधित बनाने ले जाती हैं रस, रानी की खिदमत में फिर जाती बस! हरे चमकते पत्तों की बिछा कर चादर बुला रही मधुबन…

  • ओम
    “ओ पाखी!”
    है कितनी बातें,तेरे पास ,ओ पाखी!प्रातः उठते ही फुदकती , चहचहाती!
    दुनिया को क्या मौसम की सूचना हो देती ?
    या मिल कर दिनचर्या की योजना बनाती?
    उगते ग्रीष्म सूर्य से क्या तू परेशान नही होती?
    चुपचाप बैठ घने पेड़ों में,स्फूर्ति क्यो नही बटोरती?
    रखा है तेरे लिए, दाना और सकोरे मे पानी
    चुग लेनाआकर,दो बूंद सही पी लेना गौरैया रानी!
    मुझे तो कुछ नही दीखता,तू क्या है चुगती?
    चंचल ढूढ़ती आखों से तू जाने क्या है पाती।
    चूं चूं ,चींचीं,कुहुक कुहुक कर जाने कौन सा राग सुनाती
    तेरी भाषा जो समझ लेती,मै संग तेरे बतियाती!
    होता कितना समय मनोरम,तुम और मै ढेरों बातें करतीं ,
    तुम अपनी उडान बताती,कह सुनकर दोनों कितना हंसतीं!
    दे देती दो पंखो अपने,तेरे ही संग मैभी उड़ चलती!
    ऊंचे पहाड़,बादल बीच फूलों के बाग देख हम आतीं!
    सच मानो,रोज सुबह, बाट तेरा मै ब्याकुल हो,जोहती,
    तेरी मीठी बोली सुन,बीच डालियों में, तुझे हूं खोजती!
    फड़फड़ा कर पंख,कभी चकमा भुझे जो तू है दे जाती,
    चकरा कर, ऊचाईयों में,तुझे खोजती मैं रहती,
    ऐ पाखी,कभी आवाज तेरी सीटी सी क्यो हैलगती,
    हड़बड़ाहट सी होती है,लज्जा से मै हूं सिकुड़ती।
    मेरे आंगन की तू लक्खी,करती घर-मन गुंजार,
    हरे भरे मेरे इन वृक्षों की, गूंज तेरी करती नव-श्रृंगार !
    ओ परी नन्ही सी!आ इन फूलो का मधु-रस तो पीले!
    इनकी कोमल पंखुड़ियों को,अपने स्पर्श से दुलार ले!
    प्रतीक्षा में तेरी ,गर्दन इनकी झुक सी है जाती,
    झूलने को डाली के झूले पर ,राह तेरा ही निहारती।
    दाना भी है कह रहा,”आ जाओ बन मेरी मेहमान ,
    स्वच्छ शीतल जल है , थकी हो,कर लो इसका पान!”
    “आज न आ सको तो, कल जरूर तुम आना,
    छुपकर ही सही,डाली पर बैठ मधुर गीत सुनाना!”
    शमा सिन्हा
    22-4-22

    May 29, 2022

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