• यात्रा

    होती कई तरह की है यात्रा गिनती परे भिन्न-भिन्न सत्रह! कुछ पूर्ण होती पैरों से चलकर, कुछ मनानुभव में तपकर, दूजे व्यवहार निभा कर , दूसरों बीच खुशियां देकर अन्य को कंधे का सहारा देकर , कभी काम में हांथ बटा कर, मन से मन का प्रेम निभाकर, बेसहारों का सहारा बनकर नीरव वन में…

  • Frolicking Sea

    Sun has risen,waves march with load  surface roll-on frothy,pearly they float! Not one ,not two, countless in crowd Following each other, roaring out aloud! I asked one day”why are you so proud? why not swim slow,why don’t you trot?” Are you not a braced on dull ventral vast And hooked to hearth on its dorsal …

  • बिडम्बना

    यह सफर या पहेलियों की इमारत मिलती नही जिसकी नींव और छत। हर पल इच्छाएं खड़ी लगाकर भीड़ ब्याकुल है चित,करने को निर्माण नीड़ । प्रयास रेखा चिन्तन का साक्ष्य लेकर बढ़ना दूसरे पल बलहीन धरा पर आसुओं का गिरना। स्वप्न धन लेकर ईक पल हवाई उड़ान भरना, जैसे वृक्ष पर श्री फल को देख…

  • “काश”

    कदम जब भी उढते है, और रास्ते पर लोग दीखते हैं। भ्रम सा हो जाता है, उम्मीद से, आंखें आगे तकने लगती। न चाहते हुए भी एक ख्वाहिश सी जाग जाती है। फिर से मन पर बरबस, ईक बेचैनी छाती है। गुजरते काफिले में ढूंढने लगती हैं, आस संजोए दो खुली पुतलियाँ, खो गए अचानक…

  • ऐ वक्त…..

    ऐ वक्त  तेरी किस्मत पर आता मुझे है  रश्कपहन कर सरताज तू बेफिक्र हो, फिरता बेशक! तुुझपर तो  बरसती हैं बेहिसाब खुदाई की रहमतें, ख्वाहिशों पर तुम्हारे नही किसी की कोई बंदिशे। हक है तुझे लकीर खींचने का जिन्दगी में सबके,हस्तक्षेप कर पल में,जीत लिया बेशक कई तमगें। किसी को कितनी  भी हो तकलीफ,  तुझे…

  • “मैं ढूंढ रही अपनी वाली होली!”

    “मैं ढूंढ रही अपनी वाली होली!” कहां छुुप गई वो रंंगीली प्यारी होली,आती जो बन अपनी, लेकर संग हुल्लड भरी बाल्टी , लाल- हरी नटखट सजनी? हमें भुलाने , मां हाथों में रखती,दस पैसे वाली पुड़िया कई, अबरक चूर्ण मिलकर जो बन जाता,चमकता रंग पक्का सही! हम शातिर बन इकट्ठा करते, बाजार में आई नई…