• “मेरी अपनी -हिंदी भाषा “

    मंच को नमनमानसरोवर साहित्य अकादमीमानसरोवर ई बुक पत्रिका हेतु, मेरी रचनादिनांक -12.9.24विषय -“मेरी अपनी- हिंदी भाषा “मेरी अपनी हिंदी भाषा” हृदय से आभार है मेरी अपनी हिंदी भाषा को।सौहार्द जगाकर जोड़ जाती मेरे सबअपनों को।। दूर देश बसे बच्चों में घोल देती असीम मृदुलता।मिलाती हर समय सहेलियों को इसकी सहजता।। कोयल सा कोमल सुरीला होता…

  • मंच को नमन ।महिला काव्य -मंच प. रांचीतिथि -२८.८ २४विषय -बतरसविधा- दोहाशीर्षक – बतरस “बतरस”

    बतरस होता है तब ही रस भरा।जब मिलता है मन उमंग भरा।। लौटता जैसे है बचपन फिर से।मस्त बने गांव गली में फिरते।। कितने मनोहर सब नटखट से सीखते।चतुर राबडी की कई कथा है सुनाते।। हार नहीं वे किसी से मानते।बढ़ चढ़ कर सब शेखी बघारते।। झूठी सांची धटना को जोड़कर।नये नये तिलिस्म तीर वो…

  • मनमोहन बाल रूप कान्हा का

    मानसरोवर काव्य मंचदिनांक:२६अगस्त२०२४विषय: मनमोहन बाल रूप कान्हा काविधा: कविता “मनमोहन बाल रूप कान्हा का” बड़ा ही मनमोहक है, श्याम यह रूप तुम्हारा।चित को यूं ठंडा करता जैसे हो मेघ कजरारा।। इसमें भरी चंचलता ने मोहा है संसार सारा।सांवरा तेरा रूप बना रौशनी भरा ध्रुव तारा।। तेरी एक झलक पाने, गोकुल हर पल राह निहारा।“छछिया भर…

  • मैंने हंसना सीखा है

    खिले पुष्पों को देख मैंने सीखा उनसे नई बात। छोड़ अपेक्षा, डालों को देना अमित चाहत।। किसलय से लेकर रक्त -रंग,दे देना उसको मात। वह रह जाते हरित, फूल सजते रंग भरी पांत।। गिनते नहीं कुसुम कहां खिले, बंजर या बरसात । पंखुरी की नस मे सजाते रेशमी धागा कात।। उनके बीच फिर नित नूतन …

  • रोको ना मुझे

    बह जाने दो मुझे, अब जिधर मन चाहता है। रोको ना आज मुझे, यही आज जी चाहता है ।। बेगानी हवायें खींच रही,मन दिशा चाहता है। नये सावन की टपकती बूंदें पीना चाहता है।। पूछो ना मुझसे कुछ,कारण ना कहो बताने को।रोको ना मुझे,पहले जरा स्वाद उनका ले लेने दो। देखा था मैंने पत्तों से…

  • अच्छा लगता है

    अच्छा लगता है सुबह शाम की तफरी। जबरदस्ती,पैर तलाशते हैं अपनी हस्ती।। छुप कर बगल से जब चंचल हवा है गुजरती। छूकर तन मन को, वो व्याकुल सा कर जाती।। लगता है वे मुझे अपने संग उड़ा ले जायेंगी। मुस्कुराते चेहरों से कभी भेंट करायेंगी।। कभी करूणा भरी तस्वीरें मुझे दिखायेंगीं। मेरी ज़िन्दगी कैसी हो…