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  • ऐ वक्त…..

    March 28, 2023

    ऐ वक्त  तेरी किस्मत पर आता मुझे है  रश्कपहन कर सरताज तू बेफिक्र हो, फिरता बेशक! तुुझपर तो  बरसती हैं बेहिसाब खुदाई की रहमतें, ख्वाहिशों पर तुम्हारे नही किसी की कोई बंदिशे। हक है तुझे लकीर खींचने का जिन्दगी में सबके,हस्तक्षेप कर पल में,जीत लिया बेशक कई तमगें। किसी को कितनी  भी हो तकलीफ,  तुझे…

  • “मैं ढूंढ रही अपनी वाली होली!”

    March 22, 2023

    “मैं ढूंढ रही अपनी वाली होली!” कहां छुुप गई वो रंंगीली प्यारी होली,आती जो बन अपनी, लेकर संग हुल्लड भरी बाल्टी , लाल- हरी नटखट सजनी? हमें भुलाने , मां हाथों में रखती,दस पैसे वाली पुड़िया कई, अबरक चूर्ण मिलकर जो बन जाता,चमकता रंग पक्का सही! हम शातिर बन इकट्ठा करते, बाजार में आई नई…

  • “मैं ढूंढ रही अपनी वाली होली!”

    March 14, 2023

    कहां छुुप गई वो रंंगीली प्यारी होली,आती जो बन अपनी, लेकर संग हुल्लड भरी बाल्टी , लाल- हरी नटखट सजनी? हमें भुलाने , मां हाथों में रखती,दस पैसे वाली पुड़िया कई, अबरक चूर्ण मिलकर जो बन जाता,चमकता रंग पक्का सही! हम शातिर बन इकट्ठा करते, बाजार में आई नई तकनीकी, भैया दीदी काम आते,पोटीन की बनती…

  • नील-मणि-अपराजिता

    February 6, 2023

    नील मणी बनकर तू आई!

  • आदतें बदल रही है”
    आदतें बहुत बदल रहीं हैं, अब मेरी
    खर्च की लकीर हो रही कुछ टेड़ी,
    पहले मन को बहुत दबा लेती थी
    अक्सर अब छूट, मैं हूँ दे देती।
    तब पाई-पाई का हिसाब थी रखती ,
    अब लंगर से निकली, नाव सी है बहती
    ज़बान की उड़ान पर पोटली है खुलती,
    दबी इच्छा को अब कर लेती है वह पूरी ।
    सफर में पहले पराठा लेकर थी चलती,
    टिफिन को छोड़ देख खोमचे अब मचलती,
    खुलती टेबल पर,कप नूडल्स हूँ ठंढाती,
    चुस्कियाँ ले लेकर ज़बान से है सुरकती!
    सोचती ,क्या इंसान ऐसे है बदल सकता?
    सिक्के गिनने वाली से ये कैसे है हो सकता?
    क्या उसे अब कल का भय नही है सताता?
    या कुछ इस पल को भी मन जीना है चाहता?
    संजोती थी तिनका तिनका वह छुपा कर,
    “साँसे गिनी होती है”, कटु सच्चाई भूलकर,
    जुदा हुआ साथी जबसे, यूँ मुँह मोड़ कर,
    उचट गया भरोसा, कल के औचित्य पर!
    अनुभव कहता,क्या पता कब क्या होगा,
    जो इस पल है कौन जाने, क्या आगे होगा?
    कल की उम्र, उसका रचयिता ही जानता होगा,
    “आज-अभी -अब”,बस इतना ही हमारा होगा!
    अनूभूति यही,उसे भी है निरंतर खंगालती,
    बदल जायेगा कब रास्ता,वह नही है जानती
    थमे मोड पर, मनमर्जी कर लेना वह है चाहती
    अचंभित हो,वह खुद को ही रहती है निहारती।
    शाम सिन्हा
    17-12-19

    January 15, 2023

  • शूरवीरों को नमन!
    शक्ति स्तम्भ को देखना है जिन्हें,सशरीर चलते हुए,
    तो आकर,हमारे भारत की सीमा पर आपको देखले!
    वीर- रक्त सिन्चित संताने, पग-पग सचेत ध्वजा लिये!
    द्रृढता से जिनकी, पर्वत भी पाठ हैं नये नित सीख रहे ।,
    सागर के ज्वार भाटे नई ऊचाईयों को है ,निरंतर छूते!
    प्रशस्त लहरा रहा तिरंगा, हो आश्वस्त इन सींह- वीरों से,
    थम जाता समीर हतप्रभ,देख पाषाण-बाजू शमशीरों के!
    फूलों की तकदीरों में भी, उभर रहे हैं रग नय तबदीली के,
    बढ रही ऊम्र उनकी,हारकर बिखरते नहीं वो अब जमीन पे!
    मातृ नमन ,सिर ऊचां कर,कह रहा हिंद सारे संसार से –
    “रक्षित द्योढी है हमारी!”,धरा-आकाश, गूंजती यही आवाज है!
    “कीर्ति और मान वही, निखरता जिससे सर्वोच्च देश हमारा है!
    राधा-सीता, कृष्ण -राम ,सबने दिया एक ही हमेंआदर्श है –
    है कर्तव्य, भारत का धर्म और धर्म ही हिंद देश कर्तव्य है !”
    जय भारत मां।
    जय हिंद के वीर।
    शमा सिन्हा
    26-01.2020

    January 15, 2023

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