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“देखो मचा धमाल, हुआ ये कैसा हाल!”
मनभावन यह मौसम,बसंत लेकर है आया देखो गूंंजा बुलावा कृष्ण की मधुुर बांसुरी का! “ना आउंगी खेलने होली,तुझसे ओ चितचोर, तूने किया विह्वल ऐसा,पिहू! पिहू बोले मोर! वृंदावन के छोरों में ऐसी लगी आज है होड़, किसने कितनी मटकी फोड़ी, कन्हाई रहे जोड़! मैनें भी कसम है खाई,रंग तब ही उनसे लगवाउंगी , आज माधव…
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“ओ अश्रृंखल बादल!”
मकर रेखा से उत्तर दिशा में कर रही था अविका गमन, तभी बादलों के बीच क्योंकर करने लगा रवि रमण ? बसंत आया ही था कि नभ पर हुई शयामला रोहण! “हितकर नही होता इस वक्त मेघों का जल समर्पण !” कह उठी धरा उठा हाथ,अपनी हालत श्यामल मेघ से। पर वह उच्चश्रृंखल करने लगा मनमर्जी…
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होली
हे कृष्ण, तुम लेकर रंग ना आना इस होली पर, कुंज गलिन ने बिछा दिया, चम्पा गुलाब राहों पर ! गिनती करते मैं थक गई,बीते कितने सूने पहर, करना ना तुम बहाना अब देखो टूटे ना मेरा सब्र! “लौटूंगा शीघ्र!” कह कर,छोड़ गये हमें गोकुल में, सखा ढ़ूढ थके तुम्हे,गलियां मथुरा-वृंदावन राहों के! खेलेंगे हम …
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भगवान विष्णू
दिया यह अस्तित्व मुझे तुमने स्वीकारा तुम्हे पिता है हमने! दौड़ रहा जो लहू है जग में, कण कण है अनुग्रहीत तुमसे! चकित हूं देख तुम्हारी महारथी! स्वतः कैसे सारी क्रियायें हैं होतीं! आंख चहूं ओर सहज है देखतीं पलक झपकते तंत्र सूचना देती! पानी पीना है या भूख है लगी! अंग करते पूर्ण इच्छायें…
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बसंत
शीथिल हो रही प्रकृति को किसने है जगाया? गम्भीर मन उसका किसने चंचलता से नहलाया? धरा सुप्त पड़ी थीं अभी , किसने उसको बहकाया? चुनरीओढ़ा झीनी-पीली, पायल किसने है पहनाया! वह कौन शुक-सवार है जो पांच बाण लेेकर आया? बना कर हर कोना रंगीन,खेतों में भी फूल सजाया? समीर ने पी लिया मधुरस कोई,इत-उत है फिरता…
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होली
मोर ने वन में पीया पिया मधुर रट है लगाई प्रेम रंग अपटन चढ़ा मोरनी होली खेलन आई! कर रहे बाग-भौरे गुंजार,हवा में बज रही शहनाई ! खुशबू ने घोला भंग तुलसी में,बेणु ने है सबकोपिलाई ! चकोर से पूछा चांद ने”क्यों तूनेऐसी हालत बनाई ? देख मुझे हो रहे मदहोश,जैैसे रांंझा ने हीर हो…