• शिव

    निर्विकार  चिरंतन सत्य हो तुम ही! निराकार  रुप का आकार तुम ही! जन्म मृत्यु परे शक्ति पुंज विराम हो! तुम्ही चेतना,अवकाश तुम ही हो! आरम्भ विहीन तुम अनन्त धाम हो! सती कैलाश रमें, कैसे सम्बन्ध विहीन हो? ओंकार स्वरूप, हो आधार सनातन ! सृष्टिकाल से भी तुम हो पुरातन ! दयावान तुम बने, जीव हृदय विराजते…

  • “उम्मीदों का दिया”

    उम्मीद का दिया जला कर है रखा बहते नीर को कभी नही है रोका यह नही कह कभी सकती मैं, आस सदा के लिए थी दफ़्न हुई ! हां इच्छा को दबाने की कोशिश से मिजाज रूखा सा जरूर हुआ था! चांद बिखेेरता था अपनी रौशनी ! सितारे भी थे तब संंग टिमटिमाते! चांदनी शर्म…

  • यादों के झरोखे से

    कई एक चित्र सामने आ जाते हैं। जब जब झरोखों को खोलते हैं! तब कन्या जन्म ना था शकुन , पर रखा उन्होने बना प्रेम-प्रसून ! जन्म पर दिया डाक्टर को कंगण, त्योहार सा बना दिया वातावरण ! मैं गुड़िया छोटी सी ,फ्राक पहने , धारीदार स्वेटर, कलाई पर गहने! पापा बनाते मेरे लिए अनेक…

  • जिन्दगी जवाब दो!

    पलट कर देखती हूं कभी जब भी तुझे तो देती मैं घबड़ा कर सोचना छोड़ दिमाग के पट बन्द करना हूं चाहती सोच से परे तू भयावह है दीखती अचरज है कैसे तेरे रास्ते मैं गुजरी! कितने पाप किए थे,कितनी गलतियां? पूूछती , क्याऔर कुछ है अब भी बाकी? हिम्मत का क्या यही लिखा होता…

  • जबसे मुस्कुराना

    शिकायतें सारी हो गईं हैं अब पानी हुनर सीखा है जबसे होठो ने धानी दूूर हो जाती है इससे कई परेशानी बिना बोल, बोलती यह ऐसी वाणी ! पास रहता सबके,यह धन होता ऐसा ! फर्क इतना, हम रखते नही अपने जैसा तोलते सुकून से नही, बना बाट पैसा! फिर सख्त होठ दे ना सकेंगे…

  • कैक्टस

    देख कांटे अनेक उसके सब कहते,”दूर रहो!” पर वह मस्त मौला गुंजारता”मुझसा जियो!” मैनें पूछ ही दिया,”ऐसी क्या बात है तुम में?” बताओ ,क्या है बल,क्यों इतना शोर मचा रहे?” “समझ जाओगी,बस कुछ ठहर जाओ मेरे पास!” मैं चकित थी,स्वर में भराथा उसके स्नेह सुबास। दिखाया उसने,निकट ही खिला उसके गुड़हुल पुष्प। एक पहर बीता,शाम…