• बीते वर्ष की सैर/जाता हुआ वर्ष

    अनुुभव बहुत सारे बटोरकर रख लिया है। इसीलिए लिए तो आज वह याद आया है। समेट अपने सारे,एक एक रंग बिरंगे पंख ठंड मे हीआया था,उड़ गया फुर्र से नभ! स्वस्थ और मस्त था”दह-चूड़ा”,सूर्य-संक्रांती का, लाजवाब स्वाद खिचड़ी-चोखा,पापड़ अचार था! फिर मची धूम शादी ब्याह और भोज के न्योता से। उम्र के इस मोड़ पर,इम्तिहान…

  • “लम्बे सफर में”

    गतिरत रचना प्रभू की जैसे है विचरती। सूर्य-चंद्र और नभ की विधा सारी दीखती । यह जीवन भी अविरल चलता सदा रहता है! बिना रुके कर्म का हिसाब करता रहता है। सारे जीव बंटे है कर्म अनुसार कई श्रेणी में। गगन और धरती के बीच डोलते हैं बंंधन में। सफर यह नायाबअंतहीन चलता ही रहता…

  • अयोध्या नगरी

    जला रहे सब सगर नगरी में घी का दिया, सज गई जोड़ी ,अयोध्या के राम और सिया। साकेेत नगर वासी देखो ले रहे हैं उनकी बलैया, वारी जायें, कौशल्या,सुमित्रा केकैई तीनों मैया! मच गई राजसी धूम देखो दशरथ की नगरिया! देनेआयेआशीष सब देवों संग शिव-सती मैया । अगुआई करें इक्षवाकु दीपक,पीछे अनुज भैया! न्योछावर वीर…

  • जाड़े की रात

    घर मे त्योहार सा उमंग भरा माहौल था छाया मुन्नी माई के पास बेटे का टेलीग्राम था आया! दो रात की रेल सवारी करके,बेटा पहुंचा मुम्बई खुश देख छोटी बहन को, नांचने लगा नन्हा भाई! ” मिल गई है मुझे नौकरी!”खबर जब चिट्ठी लाई, “जाड़े की छुट्टी में सब जायेंगे!”,मुुन्ने ने शोर मचाई ! कंबल…

  • चांद

    धीर धरकर चकोर,मन को तू जरा बांध ले! पुकारता जिसे है तू,वह तुझे ही है निहारे! पाकर एक झलक,तूझे यह क्या हो गया रे? वह व्याकुल चकवा भी तो कह रहा है- “पूर्णता चाहत की,मिलन में होती नही ! नीलाआसमान भी यूंही लहराता नही! क्षितिज के दोनों छोर से खोजता आया है धरती के संग,धूरी…

  • पापा

    दूर ना हो सके हम जिनसे,वो याद सदा हमें आते हैं! थम जाता है वो मंजर,उनकी ही बातें हम दोहराते हैं! हमारी लेखनी, हमारी भाषा,संस्कार जो हमें वो दे गए, शरबत में हो चीनी जैसे,चिंतन-मनन में गहरे पैठ गये! जीवन के सिद्धांतों में ईमानदारी को सर्वोत्तम बतलाए। “समय नाआयेगा लौट कर”, सीख उन्हीं से हम…