• प्रशंसा

                  कल तड़के सुबह सवेरे,आया जब नगर निगम से पानी। स्फूर्ति से उठाकर पाईप मैं चल दी नहलाने क्यारी धानी। बोल उठी खिली बेले की कलियां”देखो हुई मैं सयानी! मेरी खुशबू पाकर, तेजी से आ रही वह तितली रानी।” “अभी अभी मै खिल रही हूं,प्यास बुझा दो देकर पानी। दो क्षण पास ठहर जाओ,बातें बहुत…

  • “आशीर्वाद “

    मन के सद्भावों पर आरूढ़ ,करता बल संचार , असमंजस में असमर्थ की करता है यह बेंड़ा पार! मात-पिता- गुरू- देव से अविरल होता यह संचार शिरोधार्य कर लेता जो शीश , वह जाता वैकुंठ पार! फल फूल रहा वह मानव,यह धन जिसके पास है निर्धन बन जाता बली,जिसके कर्मो में इसका वास है! लक्षमन…

  • “नमस्कार”

    मिलन भर जाता है इसकी विनम्रता के मिठास से, सुखमय बनती है सभा सभी,इसके ही सौगात से! डूबता है हृदय हमारा विनीत प्रेम के उद्गार में, झुक जाता है शीश सभी का स्वागत के आभार से! अग्रज -अनुज सभी , अति उमंंग आनंद- विभोर हैं होते, विलक्षण इसके अनुुराग सेअपना पक्ष भी सभी हैं भूलते!…

  • “चांदनी रात”

    पग पग मोती लुटाता देखो,आया बन कर सजीला बन्ना चांद गांठ जोड़ ठुमकती आई है दुल्हन नखरीली चांदनी साथ! रात्री ने नभ की नीली चुनरी पहनाई उसमें बुनकर तारों का साज, चार पहर रस्म निभाकर, बन्ना-बन्नी होंगे इक दूजे के आज ! लेकर शहनाई बैठा चकोर, दे रहा चेतावनी वह सोमदेव को, “रूप प्रिया का…

  • “आशीर्वाद “

    महिमा नापी ना जा सकती,ऐसा अमोल है होता आशीर्वाद, असंभव को भी संभव करता,पाकर इसे सभी होते कृतार्थ ! देव,ॠषी ,नर और असुर, इससेे सभी बलशाली हैं बनते, जागृृत करती यह शक्ति अनूढी,अतुुल वीर हम बन शत्रु पछाड़ते! करती पूर्ण सबकी कामना ,शगुन भी इसमें है नित दर्शन देते, “इक्ष्वाकु-वंशज आशीष”जैसे विभीषण को लंका नृप…

  • मर्यादा

    विनीत समाज में बनती जो व्यवहारिक सम्मान की सीमा! विचारों को लोकलाज से संयमित करने वाली वो शिक्षा ! दहलीज पर ही रोक दे जो आगे बढ़ते उत्श्रृंखल कदमों को! परिभाषित करे श्रीराम वनवास और सीता के तिनके को! परिवार की लज्जा का रक्षक, पहनाये कवच जो शील को ! प्रतिष्ठा का रखे देेश-मान,दिशानिर्देश दे…