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“अहंकार “
सर्वशक्तिमान, जब स्वयं को समझ लेता है इंसान ,उत्पन्न होता है अहंकार और विकृत होता है स्वमान! होती नष्ट समझदारी,मिट जाता मानव सम्मान,प्रतिपल तब करता वह अपनी मूढ़ता पर अभिमान! वाचाल बन कर,करता सिद्ध नासमझी का सिद्धांत ,छोड़ गुरु से पाई सुशिक्षा, स्वरचित गड्ढे में गिरता कालान्त! गर्भित बुद्धिहीनता उसकी करती ना कभी किसी का…
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खिलौना”
देखते तो सभी हैं,खिलौने को खिलौने से खेलते,भूल जाते सच्चाई ,बीच का फर्क नही समझ पाते! बंधी होती है एक की डोर आकाश पार,दूजा निर्जीव किंतु लुभाता दिखा रंंगीनआकार! एक स्वत्: दिखाता भावों की प्रधानतादूसरे को कृत्रिम चाभी देकर चलाना है पड़ता! भूल कर सरताज परमपिता का साम्राज्य वह हंसता है,वह जड़ मूर्त कृत्रिम खिलौना…
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“नया सवेरा”
गहराते आकाश पर छिटकने लगती है लाली!फूटने लगता है उजाला,चीरकर रात्री काली! समस्त नभ में गूंंजता है परिंदों का कलरव,नीलाभ हो जाता है गतिशील शीतल अरणव! धरा कर सर्वस्व समर्पित बन जाती मूूक दृष्टा,चल पड़ता मनुष्य सिद्ध करने अपनी श्रेष्ठता! इच्छा और अभिलाषा की मचती धराशायी प्रतियोगिता,बिदा होती सुख-शांति,देकर सिर्फ असीमित व्यथा! सम गतिमान, सप्त…
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“मेरी नई समझ”
देख कलआई, मैं एक साथदो अजूबे दृश्य।दोनों ने ही दर्शाया विस्मृत पुराना विलक्षण सत्य! समृद्ध जश्न का माहौल था,आयेअतिथि थेअनेक!दूजे मेंअगल-बगल के थे पड़ोसी, सब मस्त दिलफेंक! एक सभा उन अमीरों की थी, पग-पग पैसे फेंक,इनकी बात अलग थी,हंस मिल खाये रोटी सेंक! धनिक चेहरों पर छाया था अकारण हीआक्रोश !पर इनकी मस्ती अनंत बनी,सब…
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“उम्मीद का जादू
पूरी होती दीखती जब आस,क्षण में आ जाती खुशी पास! अर्से से रुका अगर जटिल काम,उम्मीद लगाती शंका पर विराम! कभी ये क्षणिक ही देता है आराम ,फिर भी रौशन हो जाती है शाम! व्यथित चित हो जाता है तब शांत,सीमित होकर बहता सागर प्रशांत! अक्सर चलंत होती है यह शांती,किंतु इसके उजाले से मिटाती…
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” प्यार का बंधन”
पुकारो प्रेम से ,कहो ना उसे,बंधन!वह तो बना है मेरे हृदय का स्पंदन !मासूमियत गर्भित वह महकता चंदन,करता मन जिसका प्रतिपल वंदन! वह पास रहे या हो कितना भी दूर ,गूंजती रहती उसकी तान सुरीली मधुर,धड़कती श्वास में बसे हैं उसके ही सुर,मेरा जीवन बना जैसे राधा का मधुपुर! क्या कह कर यह रिश्ता मैं…