कहता है मन।


दिनांक:-१४जुलाई२०२५
शीर्षक:-“कहता है मन”
विधा:- कविता "कहता है मन"

कहता है मन, तुम हो यहीं ,सदा मेरे पास।
मज़ाक में भी , दूर जाने का ना दो आभास!

गुजर गए कई साल,यह होता नहीं विश्वास।
पल पल जुड़ती रहती है कुछ वज़ह खास!

भूलता नहीं कभी, तुम्हारा वह परिहास
मज़ाक में तुम जब रोक लेते अपनी श्वास।।

बेचैनी से मैं दौड़ती,जो होते पड़ोस, पास।
बिखरी मुस्कराहट का सह ना पाती थी हास।।

हमारी बेचैनी का तुम्हे कभी ना हुआ अंदाज।
तुम क्या समझो, कहां था, मेरी श्रद्धा का वास।।

उन्हीं यादों के सहारे कभी टूटी ना मेरी आस।
बार बार कहता है मन, तुम हो सदा मेरे पास।

स्वरचित एवं मौलिक।

शमा सिन्हा
रांची, झारखंड।