कैसे दूर करूं यह बेचैनी

रहते हो साथ सदा तुम मेरे

मन भ्रमित रहता तेरे ही द्वारे।

जानते मेरे भविष्य की होनी ,

फिर भी  सताती मुझे बेचैनी ।

बता ना सकूंगी अपनी अनुभूति ,

संशय जो मन में संचित है करती।

मेरी कोशिश अथक हो जाती बेकार

कठिनाई का मिलता नहीं कोई सार।

तुम्हीं एक मुझको लगा सकते पार

सम्भल ना सकूंगी, स्वीकृत है हार।

कहने को जग में है सब ही अकेले

चाहिए साथ तुम्हारा मुझको पहले ।

गलती पर मेरे देना ना तुम ध्यान,

रख कर नंद,मेरी लाज, बढ़ा लो शान!

मुझे सदा जो भ्रमित है करती